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भारत के प्रथम प्रधानमंत्री कौन !सुभाष चंद्र बोस या पंडित नेहरू ?

मोदी जी ने बड़ी दुविधा पैदा कर दी है समझ में नहीं आ रहा है कि पहला प्रधानमंत्री सुभाष चंद्र बोस को लिखूं या जवाहरलाल नेहरू को और प्रतियोगिताओं के विद्यार्थी क्या करें इस पर सरकार की तरफ से शीघ्र प्रकाश डाला जाए……

बिना किसी लाग लपेट के स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि जब से कांग्रेस का इतिहास है तब से ही वह भारत को पूरी तरह समाप्त करके इसे मुस्लिम ईसाई राज्य बनाने पर आमादा है इसका कारण लिखने की बहुत आवश्यकता नहीं है 1885 में जब कांग्रेस का जन्म हुआ उस समय अफगानिस्तान पाकिस्तान नेपाल भूटान वर्मा लंका मालदीव भारत का ही अंग था और तिब्बत भी लेकिन एक निश्चित षड्यंत्र के तहत पहले तिब्बत उसके बाद नेपाल फिर भूटान फिर अफगानिस्तान भारत से अलग किया गया! और अंग्रेजों ने कूटनीतिक के द्वारा लेडी माउंटबेटन और नेहरू के सहयोग और गांधी जी के समर्थन से भारत को पाकिस्तान बांग्लादेश में बांट दिया और फिर श्रीलंका मालदीव इत्यादि देश भी निकल गए!

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आप सबको याद होगा कि जब खान अब्दुल गफ्फार खान ने रोते हुए कहा था कि हमें गांधी जी और कांग्रेस द्वारा भूखे भेड़ियों के सामने फेंक दिया गया है लेकिन उनकी बात को कभी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रकाशित ही नहीं करने दिया गया इसके अलावा नाथूराम गोडसे का न्यायालय में दिया गया बयान भी अब सामने आया सुभाष चंद्र बोस की मौत की गुत्थी अज्ञात ही रह गई दीनदयाल उपाध्याय जी शास्त्री जी कितने उदाहरण गिनाए जाएं फिर पूर्वोत्तर भारत को एक पतले गलियारे से जोड़कर वहां विकास का कुछ भी काम नहीं हुआ धीरे-धीरे इसाई मुस्लिम बाहुल्य होता गया लेकिन बड़ाई करना चाहता हूं पूर्वोत्तर भारत के लोगों की जो अपने अर्जुन के राजवंश से जुड़े होने का स्वाभिमान नहीं भूले और कांग्रेस को जड़ से उखाड़ दिया!

इसी तरह नसबंदी में इंदिरा गांधी ने हिंदुओं की सामूहिक और भीषण पैमाने पर नसबंदी कराई जबकि मुसलमानों को छुआ तक नहीं बांग्लादेश से एक करोड़ शरणार्थी लेकर वापस नहीं भेजा ना बांग्लादेश भारत में मिलाया उल्टे लोग कहते हैं कतर में बड़ी शानदार जीत हासिल की आज एक करोड़ बांग्लादेशी 5 करोड़ से अधिक होकर भारत के सिर दर्द बन गए हैं इस तरह अनगिनत काम सिद्ध करते हैं कि कांग्रेस सनातन हिंदू धर्म को मिटा कर निश्चित रूप से मुस्लिम ईसाई भारत बनाना चाहती है और उसमें काफी हद तक सफल हो चुकी है !


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कर्नल शौकत अली मलिक ने पहली बार भारतीय जमीन में भारत का झंडा फहराया था। कर्नल मलिक आजाद हिंद फौज के सैनिक थे। 1947 को दूसरी बार झंडा फहराया गया था। कांग्रेस ने इतिहास में जबरदस्ती ये तथ्य छुपाए थे। चंद्र बोस ने अंडमान-निकोबार द्वीप का नाम बदलकर शहीद और स्वराज द्वीप रखे जाने की मांग करते हुए कहा कि सुभाष चंद्र बोस ने यही नाम रखा था।

भारत की आजादी के इतिहास को सही तरीके से लिखा नहीं गया है जिसमें विकृतियां हैं। हमें लगता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस और भारतीय राष्ट्रीय सेना (आईएनए) की भूमिका को ठीक से चित्रित नहीं किया गया है। हमें लगता है कि केंद्र की वर्तमान सरकार को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न प्रकाशित लेखों में विकृतियों को सुधारना चाहिए और नेताजी तथा आईएनए की भूमिका ठीक से चित्रित करना चाहिए,” चंद्र बोस ने कहा।

अचानक एक कार्यक्रम तय हुआ कि इक्कीस अक्टूबर को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी लाल किले से तिरंगा फहराएंगे और नेताजी सुभाष बोस की याद में वहां एक संग्रहालय का भी उद्घाटन करेंगे। क्यों ?

21 अक्टूबर 2018 को प्रधानमंत्री श्री मोदी उसी आरजी-ए- हुकूमत ए आज़ाद हिन्द की स्थापना की 75वीं जयंती लाल किले पर भव्यता से मनाएंगे। सोचिये अगर कांग्रेस का राज होता तो ऐसा हो पाता क्या ?

भारत के प्रथम प्रधान मंत्री के नाते पंडित नेहरू का हम सम्मान करते हैं लेकिन क्या 1943 में स्थापित आज़ाद भारत की प्रथम अस्थायी एवं विदेशस्थ सरकार के राष्ट्राध्यक्ष के नाते सुभाष चंद्र बोस को माना जा सकता है ? इस पर विचार होना चाहिए। और आशा की जानी चाहिए कि इतिहास की भूल को सुधार कर संसद में एक सर्वसम्मत प्रस्ताव लेकर सुभाष चंद्र बोस को भारत की प्रथम अस्थायी एवं विदेशस्थ सरकार के प्रथम प्रधानमंत्री का स्थान दिया जायेगा।

सिंगापुर में ही उन्होंने आज़ाद हिन्द फौज की एक प्रकार से पुर्नस्थापना की, क्योंकि 1942 में मोहन सिंह द्वारा स्थापित आज़ाद हिन्द फौज उसी वर्ष दिसम्बर में विघटित कर दी गयी थी। अब अनेक ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकारें सुभाष बोस के भारत स्वतंत्र कराने के अभियान को मदद देना चाहती थीं पर उनको इसके लिए आवश्यक था एक ऐसा सरकार का ढांचा जिसे वे मान्यता दे सकें। इसलिए सुभाष बोस ने 21 अक्टूबर को आरज़ी हुकूमत ए आज़ाद हिन्द की स्थापना कर स्वयं उसके राष्ट्राध्यक्ष का पद संभाला।


अगर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र के शब्दों पर विश्वास किया जाए, तो नेताजी भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। नेताजी के प्रपौत्र चंद्र बोस के अनुसार, भारत की स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को दोबारा लिखे जाने की जरूरत है। उनके अनुसार नेताजी ने 1943 में स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार स्थापित की थी इसलिए नेहरू दूसरे प्रधानमंत्री थे। चंद्र बोस के मुताबिक नेताजी आजाद हिंद फौज के प्रमुख थे और उन्होंने अंडमान-निकोबार द्वीप में भारत का झंडा लहराया था। नेताजी भारत के पहले प्रधानमंत्री थे भले ही निर्वासित सरकार के पीएम थे।

यह भारत की बाहर घोषित भारत की प्रथम स्वतंत्र सरकार थी जिसे ग्यारह देशों ने मान्यता दी- इनमें जर्मनी, इटली, नानकिंग चीन, थाईलैंड, बर्मा, क्रोएशिआ, फिलीपींस, मंचुटो और जापान शामिल थे। नेताजी सुभाष चंद्र बोस को मिल रही अंतरराष्ट्रीय सहायता और मान्यता ब्रिटिश सरकार के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय थी और भारत को 1947 में मिली आज़ादी का कारण गाँधी जी का अहिंसावादी आंदोलन नहीं बल्कि सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज के बढ़ते कदम थे। 1943 में स्थापित आज़ाद भारत की प्रथम सरकार के राष्ट्राध्यक्ष के नाते भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू नहीं बल्कि सुभाष चंद्र बोस हैं और आशा की जानी चाहिए कि इतिहास की भूल को सुधार कर संसद में एक सर्वसम्मत प्रस्ताव लेकर सुभाष चंद्र बोस को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री का स्थान दिया जायेगा।

1943 में आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना के बाद उनकी सेना ने अंडमान निकोबार द्वीप आज़ाद कराया और उसका नाम शहीद और स्वराज रखा। उसके बाद आज़ाद हिन्द फौज ने मणिपुर में मोइरांग पर कब्ज़ा किया और कोहिमा से दिल्ली की और बढ़ना शुरू किया। ‘चलो दिल्ली’ का नारा इसी समय दिया गया था। आज भारत की सेना और हर देशभक्त जिस नारे के साथ एक दूसरे का अभिवादन करते हैं उस जय हिन्द का नारा भी सुभाष चंद्र बोस का दिया हुआ है न कि गाँधी के नकली कांग्रेसियों का।

प्रसिद्ध इतिहासकार श्री आरसी मजूमदार ने अपने संस्मरणों में 1947 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमण्ट एटली का बाह्यण उद्धृत किया है जिसमें उन्होंने कहा था कि 1942 के आंदोलन की असफलता के बावजूद अंग्रेजों ने भारत को स्वतंत्र इसलिए किया क्योंकि सुभाष चंद्र बोस के सैन्य अभियान से ब्रिटिश सरकार हिल गयी थी और नौसैनिकों के ब्रिटिश सरकार के खिलाफ होने के संकेत मिल गए थे।

  गाँधी नहीं, सुभाष थे भारत की आज़ादी के सबसे बड़े कारण। 21 अक्टूबर को प्रधानमंत्री=द्वारा सुभाष बोस द्वारा घोषित भारत की आज़ाद सरकार के 75वीं जयंती के पीछे वस्तुतः तृणमूल कांग्रेस के विद्वान और सुभाष-बोस भक्त नेता श्री सुखेंदु शेखर राय की बड़ी भूमिका है जिन्होंने 10 अगस्त को राज्य सभा में इस मांग को उठाया था और मांग की थी कि प्रधानमंत्री लाल किले से इस दिवस की घोषणा करें और नेताजी संग्रहालय का उद्घाटन इसी दिन करें। इस विषय पर सुधि पाठक जेएनयू के प्रसिद्ध इतिहासकार श्री प्रियदर्शन मुखर्जी की पुस्तक ‘नेताजी सुभाष बोस एंड इंडियन लिबरेशन मूवमेंट इन ईस्ट एशिया’ का अध्ययन लाभदायक पाएंगे।

18 अगस्त 1945 को वे हवाई जहाज से मंचूरिया जा रहे थे। इस सफर के दौरान ताइहोकू हवाई अड्डे पर विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें उनकी मौत हो गई। उनकी मौत भारत के इतिहास का सबसे बड़ा रहस्य बनी हुई है। उनकी रहस्यमयी मौत पर समय-समय पर कई तरह की अटकलें सामने आती रहती हैं।

वहीं कई सरकारी तथ्यों के मुताबिक 18 अगस्त, 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मंचुरिया जा रहे थे और इसी हवाई सफर के बाद वो लापता हो गए। हालांकि, जापान की एक संस्था ने उसी साल 23 अगस्त को ये खबर जारी किया कि नेताजी का विमान ताइवान में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था जिसके कारण उनकी मौत हो गई।

बता दें कि सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और मां का नाम प्रभावती था। अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध के लिए उन्होंने आजाद हिन्द फौज का गठन किया और युवाओं को ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का नारा भी दिया।

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