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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा

       उत्तरप्रदेश के 21वें मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ को चुन कर भाजपा ने अपनी मंशा और रणनीति दोनों स्पष्ट कर दी है। अब ध्रुवीकरण, तुष्टिकरण, बहुसंख्यकों का हित, अल्पसंख्यकों की सुध जैसी राजनीतिक लाग-लपेट की कोई आवश्यकता नहीं। जो है, सामने है।

      उत्तरप्रदेश में 14 साल बाद भाजपा बहुमत से सत्ता में तो लौटी, लेकिन प्रदेश की कमान किसे मिलेगी, इसका खुलासा नहींहो रहा था। भाजपा हाईकमान ने अपनी मर्जी तय कर ली होगी, लेकिन राजनैतिक पंडित माथा-पच्ची में लगे हुए थे। कभी राजनाथ सिंह का नाम उछला तो कभी मनोज सिन्हा का, कभी सुरेश खन्ना का, कभी केशवप्रसाद मौर्य का।

      राजनाथ जी ने अपने नाम की अटकलों को बकवास बता कर खारिज किया तो सबका ध्यान मनोज सिन्हा पर गया, जो शनिवार को वाराणसी पहुंच चुके थे। उन्होंने भी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से इन्कार किया था, लेकिन फिर भी ऐसा माहौल बन रहा था कि उन्हें सत्ता की चाबी सौंपी जा सकती है। इधर संघ विचारक राकेश सिन्हा ने एक नेशनल टीवी से चर्चा में योगी आदित्यनाथ के नाम को प्रमुखता से लिया था और अंतत: यही सच साबित हुआ। खबरें हैं कि आरएसएस मनोज सिन्हा के नाम पर सहमत नहींथा, जबकि योगी आदित्यनाथ उसकी पसंद थे।

      संघ की पसंद ही शायद अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की भी पसंद थी। योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से पांच बार लगातार सांसद रह चुके हैं, इससे जनता के बीच उनकी पकड़ का अनुमान लगाया जा सकता है। गोरखपुर में तो यह जुमला चर्चा में रहता ही है कि गोरखपुर में रहना है, तो योगी-योगी कहना है। पर अब ऐसा लग रहा है कि गोरखपुर की जगह उत्तरप्रदेश करना होगा। नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री की छवि आक्रामक तेवर वाले, हिंदुत्व के पुरोधा की रही है, जो धर्म और राजनीति को अलग नहींसमझता।

       योगी आदित्यनाथ अपने बयानों के कारण कई बार विवादों में घिरे हैं। वे राम मंदिर बनाने के प्रबल समर्थक रहे हैं। ऐसे में उत्तरप्रदेश की कमान उन्हें सौंपने पर यह सवाल जरूर उठेगा कि क्या सत्ता की सर्वोच्च गद्दी पर आसीन होकर भी वे धर्म की राजनीति पर जोर देंगे या ऐसा माहौल बनाएंगे कि जनता के हर तबके को सुरक्षा का अहसास होगा, धर्म अथवा जाति के कारण कोई असुरक्षाबोध नहींहोगा?
 यूं भाजपा ने जब से सत्ता में वापसी की है, तब से विकास के दावे पर जोर दिया है। उत्तरप्रदेश में विकास के साथ-साथ कानून-व्यवस्था, महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल, किसानों की स्थिति सुधारने की बात भी की है। लेकिन इन सबमेंंदलित और मुस्लिमों का भी बड़ा वर्ग है, जिनके हितैषी होने का दावा सपा, बसपा और कांग्रेस ने हमेशा किया है।

       भाजपा के उत्तरप्रदेश में जीतते ही बरेली के जिया नगला गांव में मुसलमानों को दिसंबर माह तक गांव छोडऩे की धमकी भरे पोस्टर देखे गए। पोस्टर के नीचे योगी आदित्यनाथ और हिंदू युवा-वाहिनी का नाम लिखा था। इस पर बवाल हुआ तो भाजयुमो ने आरोप लगाया कि यह सब आजम खान के इशारे पर हो रहा है और उन लोगों ने फिर आजम खान के पोस्टर पर कालिख पोती। गनीमत है कि यह विवाद अधिक तूल नहींपकड़ पाया। लेकिन एक चिंता भरा सवाल जरूर उछाल गया है। यूं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और अब        

            उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा है कि मुसलमानों को डरने की कोई जरूरत नहींहै। यह विचारणीय है कि ऐसे बयान देने की जरूरत ही क्यों पड़ी? वैसे एक सवाल यह भी है कि 403 विधानसभा सीटों में भाजपा गठबंधन ने 325 सीटें हासिल कीं, लेकिन क्या उसे इन विधायकों में एक भी मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री के काबिल नहींलगा।

         योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य सांसद हैं, जबकि दिनेश शर्मा लखनऊ के मेयर। यह चर्चा राजनीतिक हलको में हो रही है कि पार्टी आलाकमान द्वारा क्षेत्रीय नेताओं की किस्मत तय करने की परंपरा कांग्रेस में थी। अब यही रवायत भाजपा को भी अपनी गिरफ्त में ले रही है। वैसे आदित्यनाथ सरकार पर सवर्णवादी और हिन्दुवादी सरकार का ठप्पा न लगे इसके डैमेज कंट्रोल के लिए पार्टी ने ओबीसी चेहरे के रूप में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य और ब्राह्मण तुष्टिकरण के तौर पर दिनेश शर्मा को उप मुख्यमंत्री बना दिया है। बाकी सामाजिक समरसता आदित्यनाथ के मंत्रिमंडल में कैसे बनाई जाती है, यह देखना दिलचस्प होगा।

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