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प्रेम का सच्चा प्रतीक ताजमहल नहीं दशरथ मांझी है

प्रेम का सच्चा  प्रतीक ताजमहल नहीं  दशरथ मांझी है unnamed
डॉ . सीमा सिंह


 
अकथ कहानी प्रेम की, कछु कही न जाइ।
गूंगे केरी सरकरा, बैठा मुसकाई।।

प्रेम क्या है कबीर की इन पंक्तियों के माध्यम से समझा जा सकता है। गूंगा व्यक्ति जैसे गुड़ के स्वाद का बखान नहीं कर सकता वैसे ही प्रेम को परिभाषित करना मुश्किल है। इतिहास, साहित्य और कला तमाम क्षेत्रों में प्रेम पर अनगिनत लोगों ने अपनी भावनाएं व्यक्त करने का प्रयास किया है। इसे एक सनक कहा जा सकता है। लैला मजनू, हीर रांझा, शिरी फराद, सोनी महिमाल की प्रेम कहानिया हम सभी सुनते आ रहे हैं। जायेगा। 

    प्रेम में व्यक्ति सनकी होता है, पागल होता है, जो किसी ने सोचा भी नहीं वह करने का निश्चय कर लेता है। प्रेम से बड़ा जीवन में कोई रिश्ता नहीं। कबीर का एक और दोहा है ”पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।” प्रेम के बिना जीवन अंधेरा है। प्रेम होने पर अंधेरे जीवन में भी उजाला आ जायेगा। 
    दुनिया के सात अजूबों में प्रेम की निशानी ताजमहल का नाम आता है। जिसका निर्माण शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में बनवाया था। बीस हजार से भी अधिक मजदूरों ने इसे बनाने में योगदान दिया था। ऐसी किवदंती भी जन में प्रचलित है कि इसके बाद शाहजहां ने सभी मजदूरों के हाथ कटवा दिए थे ताकि कोई दूसरा ताजमहल न बन सके। इसमें कितनी सच्चाई है यह नहीं कहा जा सकता है। 
पिछले दिनों एक फिल्म ने खूब सुर्खियां में आई थी वह थी ‘द माउंटेन मैन, दशरथ मांझी’।

    ताजमहल की तरह इनके प्रेम की निशानी में संगमरमर, नक्काशी, गुंबद, छतरियां, कीरिट कलश, मीनारे नहीं है। न ही यह कोई बादशाह थे जो महदूरों का प्रबंध कर पाते। कई मायनों में इसे ताजमहल से भी महान निशानी कहा जा सकता है। दशरथ मांझाी को हम माउंटेन मैन के रूप में जानते हैं। मजदूर परिवार से इनका संबंध था। इस व्यक्ति पर प्रेम का ऐसा भूत सवार था कि इसने एक हथोड़ा और छेनी लेकर पूरा पहाड़ खोद डाला।

    यह पहाड़ भी कोई छोटा मोटा नहीं था। पहाड़ 360 फुट लंबा, 30 फुट चैड़ा और 25 फुट ऊंचा था। इस काट छांट कर इस अकेले व्यक्ति ने सड़क में तब्दील कर दिया। इस कार्य में इन्हें कुल बाइस वर्ष लगा। आसाधारण कार्य को भी प्रेम की ताकत ने संभव बना दिया। जिस पहाड़ की दूरी पचपन किमी थी उसे मात्र 15 किमी में बदलने की ताकत प्रेम ने स्वीकारा। बहुत ही साधारण परिवार से आये मांझी दलित थे। जीवनपर्यन्त इन्होंने संघर्ष किया। 

   गांव को पार करने के लिए पूरा पहाड़ पार करना पड़ता था। गांव सभी सुविधाओं से विहिन था। प्रत्येक आवश्यकता के लिए पूरा पहाड़ पार करना मजबूरी था। अपनी पत्नी से वो बेन्तहा प्यार करते थे। एक बार खाना ले जाते हुए उनकी पत्नी उसी पहाड़ से गिर गयीं। पास में अस्पताल का न होना, प्राथमिक उपचार की व्यवस्था भी नहीं होने की स्थिति में उनकी पत्नी की मृत्यु हो गयी। इस घटना ने माझी को अंदर तक झकझोर दिया।

    शुरूआत में जब उन्होंने पहाड़ तोड़ना प्रारम्भ किया उस समय उन्हें लोग पागल करार देते थे। जितना लोगों ने उन्हें पागल कहा उतना ही उनका निश्चय और पक्का होता गया। इसी व्यक्ति का अंत 73 वर्ष की उम्र में कैंसर जैसे रोग के कारण हो गयी। ‘माझी द माउंटेन मैन’ यदि फिल्म न आयी होती तो शायद इस देश की जनता जान ही नहीं पाती कि देश में कोई ऐसा सनकी व्यक्ति रहा था। 

    जिस तरह से ताजमहल एक पर्यटन स्थल के रूप में विश्वभर में प्रसिद्ध है क्या बिहार सरकार इस प्रेम की निशानी पहाड़ को पर्यटन स्थल के रूप में प्रसिद्ध नहीं कर सकती। बहुतों की रूचि होगी कि वह इस पहाड़ को देख सकें जिसे अकेले व्यक्ति ने खोदकर सड़क बना दिया।
(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक है )

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