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[object object] एक साध्वी पर पुलिस के अंतहीन अत्याचार की कहानी 20954101 1983000101713972 4006549297118952977 n

एक साध्वी पर पुलिस के अंतहीन अत्याचार की कहानी

ये कहानी मेरे जीवन की सबसे लंबी कहानी है और कहानी है ये एक साध्वी पर पुलिस के अंतहीन अत्याचार की!
कहानी है सत्ता पाने और उसमें बने रहने को तत्पर राजनेताओं के पाप की
 
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 कहानी एक साध्वी की!
कहानी उसकी अंतहीन वेदना की!
कहानी वर्दी के अंदर शैतान बनते इंसान की!
कहानी सत्ता की भूख में वेश्या बनती राजनीति की!
 
मैं पेशे से एक पत्रकार हूँ। रातों में अपने ऑफिस में बैठकर और  दिन में उल्लुओं की तरह उँनीदा सा सोते हुए वर्तमान की आहटों से शब्दों और वाक्यों का संकलन कर समाचारों की 

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माला बुनना मेरा काम है। लेकिनआज  अतीत के पन्नों से चुराकर ये कहानी लिख रहा हूँ! कहानी लिखने की इच्छा आज उस वक्त जाग्रत हुई जब उस सन्यासिनी से मिलने मै अपने वरिष्ठ एवम भारत रक्षामंच के राष्ट्रीय संयोजक सूर्यकांत केलकर के साथ राम मनोहर लोहिया अस्पताल लखनऊ के आवासीय कक्ष में पंहुचा। जड़वत सा होकर मेरी आँखें सिर्फ साध्वी के       बातों की ओर  जमी थी! ह्रदय में वेदना,आंखों में कुछ गीलापन व कुछ हद तक नफरत का भाव लिए मैं बस देखता रहा!
 ये कहानी है एक नारी की, एक साध्वी की, कहानी है जुर्म के सागर में उसकी हिस्सेदारी की जांच के नाम पर उसके साथ हो रही हैवानियत की!
[object object] एक साध्वी पर पुलिस के अंतहीन अत्याचार की कहानी download 2साथ ही ये कहानी है वर्दी के अंदर छिपे कुछ दरिंदों की! कुछ असल गुंडों की! उन दानवों की जो शायद प्रोन्नति और पैसे की चाहत में गुलामी तक कर बैठते हैं खादी के अंदर सजे कुछ रावणों की!
समझ नही आ रहा कहानी की शुरुआत कंहा से करूँ? उस अभागी के शरीर पर पड़े अनगिनत जख्मों से करूँ
उसकी नारी सुलभ लज्जा के टुकड़े टुकड़े करके बिखरे उसके सम्मान से करूँ या फिर आरम्भ करूँ उन दरिंदों की दरिंदगी से जो सिर्फ स्वार्थ में अंधे होकर इंसान से जानवर बन गए थे
चलिए आरम्भ करता हूँ और आशा भी करता हूँ कि आप मेरी जिंदगी की इस सबसे लंबी कहानी को अवश्य अपना वक्त देंगे🙏 [object object] एक साध्वी पर पुलिस के अंतहीन अत्याचार की कहानी 1f64f🏻
 
10 अक्टूबर 2008 हाँ यही तारीख थी वो जो उस साध्वी के जीवन मे वेदना की शुरुआत लेकर आई जब उन्हें सूरत में बुलाकर वँहा से पुलिस मुम्बई ले गयी और 11 अक्टूबर से अंतहीन यातनाएं आरम्भ हो गयी। जुल्म की शरुआत की मुम्बई पुलिस के इंस्पेक्टर खानविलकर और उसके सहयोगी आवाड ने! शुरुआत के 24 दिन (13 दिन अवैध हिरासत और 11 दिन का पुलिस रिमांड) साध्वी की मानें तो नर्क से भी भयानक जीवन गुजरा!
हमारे देश के कुछ कर्तव्य परायण जांच अधिकारियों द्वारा दर्दनाक पिटाई और
बेहद अपमानजनक शब्दों से व चारित्रिक अपमान से भी प्रताड़ित किया जाता था।[object object] एक साध्वी पर पुलिस के अंतहीन अत्याचार की कहानी download 3
लेकिन सीमा से परे का अपमान सहकर भी अडिग खड़ी रही वो भगवा धारिणी! अमानवीय अत्याचार भी उसे डिगा नही सके! उसे ऐशो आराम का लालच दिया जाता था, उसे सुनहरी जिंदगी के ख्वाब भी दिखाए जाते थे! औऱ ये सब कर रहे थे “किसी” की गुलामी कर रहे खाकी वर्दी में लिपटे वो चन्द लोग जो ईमानदार और राष्ट्रभक्त वर्दीवालों को भी कलंकित करने पर आमादा थे! और उनका सरदार था मुम्बई एटीएस का एसपी  हेमन्त करकरे! वही हेमन्त करकरे जो नवम्बर 2008 के मुम्बई हमले में कसाब की गोलियों का शिकार होकर कथित रूप से ” शहीद ” हुआ!
हाँ मैं लिख रहा हूँ साध्वी प्रज्ञा की कहानी! उस साध्वी की कहानी जो 9 वर्षों के कैदी जीवन मे रोजाना ना जाने कितनी बार मरती थी
 
 उस वक्त मेरी भी आंखें गीली हो गयी थी जब साध्वी हमें यानी अरुण एवम सूर्यकांत जी को  सजल नेत्रों से अपने ऊपर हुए अत्याचारों को सुना रही थी!
उस साध्वी की मानें तो उसके शरीर का कोई अंग ऐसा नही था जिसे आघात ना पहुंचाया गया हो! जिस पर प्रहार ना किया गया हो! जिसे दर्द ना पहुंचाया गया हो!
साध्वी बोल रही थी और इंटरव्यू देख रहा मैं जड़वत सा मानो कंही गहरे में सुन्न सा हो रहा था!
 
साध्वी प्रज्ञा अपने ऊपर हुए पुलिसिया जुल्मों सितम की कहानी बता रही थी कि रात दिन पिटाई होती थी, कोई वक्त नही था पिटाई का! एक दिन तो जुल्म की इन्तेहा ही हो गयी ” ऐसा हुआ कि मुझे मारते मारते मेरे फेफड़े की झिल्ली फट गई‎ और मैं बेहोश हो गयी।फिर मुझे 5 दिनों के लिए अस्पताल ले जाया गया।पहले सुश्रुसा अस्पताल जंहा मैं 3 दिन रही। जब होश आया तो देखा कि उनके शरीर से सारा भगवा वस्त्र गायब थे  उसकी जगह उनको एक फ्राक पहनाया गया था।”मुझे वेंटिलेटर और ऑक्सीजन पर रखा गया। इसके बाद मुझे दूसरे अस्पताल में रखा गया!
रीढ़ की हड्डी टूटने की घटना बताते हुए साध्वी ने बताया कि
उन्हें पुलिसकर्मी झूले की तरह पटकते थे। जिससे सर जमीन में टकराता था, इसी दौरान उनकी रीढ़ की हड्डी टूट गयी।उनकी पिटाई की कोई निश्चित जगह नही थी।कभी एक ऑफिस में फिर दूसरे ऑफिस में उन्हें जबरदस्त तरीके से मोटी मोती बेल्टों से पीटा जाता था।
 
साध्वी की ये बातें  सुनकर शरीर में झनझनाहट होने लगी! जेहन में अनगिनत ख्याल आने लगे! प्रत्येक वर्दी वाला एक गुंडा लगने लगा!
 
इंटरव्यू चल रहा था और मेरे विचार भी तेजी से मेरे दिमाग मे चहल कदमी कर रहे थे कि क्या हिन्दुस्थान की पुलिस वास्तव में इतनी पाशविक हो गयी है? क्या वर्दी पहनते ही कुछ लोगों की इंसानियत मर जाती है, उनके अंदर का शैतान जाग्रत हो जाता है?
 
खैर आगे बढ़ते हैं!
 
अब साध्वी वो वाकया बता रही थी जब पुलिस ने गुरु शिष्य परम्परा को भी तार तार करने में कोई कसर नही छोड़ी ! बल्कि यूँ कहें कि वर्दी के अंदर का शैतान एकदम जाग्रत हो चुका था! वो किसी भी तरह उस सन्यासिन को तोड़ना चाहता था, अपने आकाओं के इशारे पर उसे झुकाना चाहता था। “मेरे साथ मेरे एक शिष्य को भी गिरफ्तार करके लाया गया था । पहले उसे अंदर बुरी तरह मारा गया, इसके बाद खानविलकर ने मेरे सामने लाकर बुरी तरह पीटा। फिर उसे मेरे सामने लाकर उसे बेल्ट दिया और कहा मार!! अपने गुरु को!
जब शिष्य, हिचकिचाया तो मैं बोली मारो मुझे !! शिष्य ने मजबुरी में मारा तो जरुर मुझे, लेकिन शिष्य का हाथ सख्त कैसे होता ?तब खानविलकर ने शिष्य से बेल्ट छीनी और  शिष्य को बेरहमी से मारते हुए बोला ऐसे मारा जाता है! इसके बाद छह सात इंस्पेक्टर्स ने एक सर्किल बनाया और बारी बारी से मुझे बेल्टों से पीटने लगे! अपनी रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी सुनाते हुए साध्वी आगे कहती हैं कि वर्तमान में ठाणे के पुलिस कमिश्नर ने तो उस वक्त मुझे तब तक बेल्टों से पीटा कि जब तक वो थक नही गया और मै गिर नही पड़ी! उस दौरान सिर्फ एक महिला पुलिसकर्मी थी जिसने सिर्फ एक डंडा मुझे मारा। जिसको परमवीर ने वहां से डांटकर हटा दिया।
 
“जैसे जैसे इंटरव्यू आगे बढ़ रहा था मेरे रोंगटे खड़े हो रहे थे! मैंने कुछ देर के लिए इंटरव्यू को होल्ड किया, खड़ा हुआ और वाटर जग से दो घूंट पानी अपने हलक के नीचे उतारा। मुझे समझ नही आ रहा था कि मैं इंटरव्यू कर रहा हु  रहा हूँ या फिर हिंदी की कोई हॉरर फ़िल्म की कोई कहानी सुन रहा हु !”
लेकिन सच्चाई तो सच्चाई थी जो एक महिला साध्वी  बयान कर रही थी। उसे मैं कैसे नकार सकता था! खैर मैंने दोबारा इंटरव्यू आगे शुरू किया!
 
 “साध्वी ने आगे बताया कि एक दिन कुछ पुरुष‎ कैदियों के साथ मुझे खड़ी करके अश्लील और गन्दा  आडियो सुनाया जा रहा था। सुखविंदर नाम का पुलिसिया ये सब कर रहा था!मेरे शरीर पर इतनी मार पड़ी थी कि मेरे लिए खड़ी रहना मुश्किल था। मैंने  कहा कि मैं बैठ जाऊँ तो पुलिस वाले बोले कि शादी मे आई है क्या कि बैठ जायेगी!! मेरी आँख बंद होने लगी और  मैं अचेत हो गई। उस वक्त जब एक कैदी ने पुलिसवालों से कहा कि साध्वी हैं ये माताजी हैं जिनको अश्लील ऑडियो मत सुनवाइये तो उस पुलिसिये ने बेरहमी से उस कैदी की पिटाई की!
 
 इंटरव्यू आगे बढ़ रहा था साध्वी बता रही थी  “मेरे दोनों हाथों को सामने फैलवाकर एक चौड़े बेल्ट से मारते थे मेरा दोनो हाथ सूज जाते थे। अँगुलियां भी काम नही करती थी, तब गुनगुना पानी लाया जाता था।मैं अपने हाथ उसमें डालती कुछ आराम होता तो मुझे कागज हाथ मे पकड़वाकर हाथों को दीवारों पर पटक्वाया जाता था। जब अंगलुियां हिलने डुलने लगती थी।तो फिर से वही क्रिया मेरे पर मार पड़ती थी।
 
आखिर कैसी पुलिस थी ये? कैसा कानून था? क्या हिन्दुस्थान में जंगलराज कायम हो चुका था? क्या सत्ता के भूखे भेड़िये चन्द वोटों की खातिर जांच के नाम पर एक अबला की चीखों को अपना हथियार बनाना चाहते थे?लेकिन वो एक सन्यासिन थी, साधक थी धर्म मार्ग की, तपस्विनी थी राष्ट्रप्रेम की ज्वाला में तपी हुई! सो अडिग थी, टूटी नही।
चलिए कुछ और आगे चलते हैं!
 
आंखों में अंतहीन वेदना और पानी भरे साध्वी बोल रही थी कि “मुझे तोड़ने के लिए मेरे चरित्र पर लांछन लगाया क्योंकि लोग जानते हैं कि किसी औरत को तोड़ना है तो उसके चरित्र पर दाग लगाओ,
मेरे जेल जाने के बाद कैंसर की सूचना से यह सदमा मेरे पिताजी सहन नहीं कर पाये , उनको पैरालिसिस हो गया और 40 दिन तक बिस्तर पर रहने के बाद वो इस दुनियां से चल बसे!सन्यासिन प्रज्ञा ने ईश्वर पर भरोसा जताते हुए कहा कि हालांकि सन्यासी सबको क्षमा करता है फिर भी मेरे अन्दर रहते ही, हेमंत करकरे को तो सजा मिल गई‎। अभी बहुत लोग बाकी हैं ठाकुरजी उनको स्वयम सजा देंगे।
इस सवाल पर कि “आपको समझ में तो आ गया होगा कि क्यों आपको इतने बेरहमी से तड़पाया जा रहा था?”
साध्वी ने कहा, “हां, भगवा के प्रति उनका द्वेश था।फूटी आंख भी भगवा को नही देखना चाहते थे।
  #भगवा को बदनाम करने का कांग्रेस ने एक सुनियोजित षडयंत्र तैयार किया था।राहुल गांधी के उपाध्यक्ष बनने के दौरान मंच से चिदम्बरम , दिग्विजय सिंह व सुशील शिंदे द्वारा बार बार मेरा व भगवा आतंकवाद का नाम लेना ये साबित कर रहा था”
 
     साध्वी ने आगे बताया कि एक बार स्वामी अग्निवेष मुझसे मिलने जेल में आया और बोला, कि “आप सह्योग करो तो चिदम्बरम और दिग्विजय हमारे मित्र हैं। मै आपको छुड़वा दुंगा.”
साध्वी बोली कि मैंने कहा , मेरे द्वारा सत्य का साथ देने की बात पर अग्निवेश बोले कि फिर भी मैं  उनसे जाकर क्या बोलू तो मैंने कहा कि “अगर आपकी उनसे घनिष्ठता है और सच में हमें छुड़ाना चाहते हो, तो चिदम्बरम से जाकर बोलो की इमानदारी से जांच करवा लें तो आप मुझे बाहर ही पाएंगे अंदर नही, क्यूंकि मैं पूर्ण रूप से निर्दोष हूँ।”
           [object object] एक साध्वी पर पुलिस के अंतहीन अत्याचार की कहानी 535324 410640725629998 753795741 n 300x126आपको बताना चाहूंगा कि साध्वी को कोई सबूत न मिलते देख और तोड़ने में नाकाम होने पर लम्बे समय तक अंदर रखने के लिए मुम्बई पुलिस ने साध्वी पर मकोका लगा दिया। लेकिन कहते हैं ना कि 12 वर्षों में तो घूरे के भी दिन बदलते हैं और वो तो साध्वी थी! हिन्दुस्थान में सत्ता बदली और साध्वी के मामले की जांच भी निष्पक्ष तरीके से आरम्भ हुई। लेकिन फिर भी साध्वी प्रज्ञा को खुली हवा में सांस लेने में 3 वर्ष और लग गए यानी कि कुल मिलाकर 9 वर्षों तक एक सन्यासिन जांच के नाम पर कैदखाने के अंदर सिसकती रही, तड़पती रही उस गन्दी राजनीति का शिकार होकर जो सिर्फ और सिर्फ सत्ता की भूखी होती है। यंहा विशेष तौर से ये भी बताना चाहूंगा कि बेल देते वक्त जज ने मकोका लगाने को पूर्णतया गैर कानूनी बताया था।
आज साध्वी बाहर अवश्य हैं लेकिन व्हील चेयर पर!
उनका शरीर पैरालाइज हो चुका है। एक जीवन्त साध्वी को खाकी ने अंतहीन यातनाएं दी, लाचार बना दिया, लेकिन वो नही टूटी क्यूंकि वो अटल थी और यंही साबित होता है कि वो निर्दोष है!
 
चलिए अंत मे आपको बताएं कि साध्वी व अन्य हिन्दू संगठनों पर उस दौरान कौन कौन से केस लगाए गए?
 
1)  हैदराबाद ब्लास्ट:
18 मई 2007 को एक ब्लास्ट  हैदराबाद के चार मीनार इलाक़े के पास स्थित मस्जिद के वज़ुख़ाने में हुआ था जिसमें 9 लोग मारे गए थे और 58 लोग घायल हुए थे। शुरुआत में इस धमाके को लेकर चरमपंथी संगठन हरकत उल जमात-ए-इस्लामी यानी हूजी पर शक की उंगलियां उठी थीं। लेकिन तीन सालों के बाद यानी 2010 में पुलिस ने ‘अभिनव भारत’ नाम के संगठन से जुड़े स्वामी असीमानंद को गिरफ्तार किया और स्वामी असीमानंद के अलावा इस संगठन से जुड़े लोकेश शर्मा, देवेंद्र गुप्ता और आरएसएस की साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को धमाके का अभियुक्त बनाया गया।
किन्तु कोई सबूत ना होने पर कोर्ट ने सभी को बरी किया।
 
2)अजमेर शरीफ़ ब्लास्ट:
11 अक्तूबर, 2007 को राजस्थान के अजमेर शहर में रोज़ा इफ़्तार के बाद अजमेर शरीफ़ दरगाह परिसर के क़रीब मोटरसाइकिल में एक बड़ा बम धमाका हुआ था।इस धमाके में तीन लोग मारे गए थे और 17 लोग घायल हुए थे।
धमाके के तीन साल बाद राजस्थान के तात्कालिक गृह मंत्री शांति धारीवाल ने आरोप लगाया था कि अजमेर शरीफ़ बम विस्फोट की भाजपा सरकार को पूरी जानकारी थी, इसके बावजूद सरकार ने जानबूझ कर आँखे मूंदे रखीं, क्योंकि इसमें हिंदू संगठन आरएसएस के लोग कथित तौर पर शामिल थे।
लेकिन इस मामले में भी 8 मार्च 2017 को स्पेशल एनआईए कोर्ट ने मुख्य अभियुक्त रहे स्वामी असीमानंद और पाँच अन्य को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। जबकि 2007 में मारे जा चुके आरएसएस प्रचारक सुनील जोशी समेत देवेंद्र गुप्ता और भावेश पटले को इन धमाकों का दोषी ठहराया।
 
3)सुनील जोशी की हत्या:
आरएसएस प्रचारक सुनील जोशी की हत्या मध्य प्रदेश के देवास में 29 दिसंबर 2007 को की गई थी। जोशी की हत्या का मामला भी 2011 में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) को सौंपा गया था ताकि देश में उस वक़्त कथित ‘भगवा आतंकवाद’ के आरोपों की जांच की जा सकें।
इस मामले में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़ीं साध्वी प्रज्ञा ठाकुर सहित हर्षद सोलंकी, रामचरण पटेल, वासुदेव परमार, आनंदराज कटारिया, लोकेश शर्मा, राजेंद्र चौधरी और जितेंद्र शर्मा को आरोपी बनाया गया था। इन सभी पर हत्या, साक्ष्य छुपाने और आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था।
लेकिन जोशी की हत्या के मामले में कोर्ट ने साध्वी प्रज्ञा सहित सभी को फरवरी, 2017 में बरी कर दिया। यह फैसला देवास में एडीजे राजीव कुमार आप्टे ने सुनाया था।
 
4)समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट:
भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस में 18 फ़रवरी 2007 को हरियाणा के पानीपत के नज़दीक धमाका हुआ था।
इस धमाके में 68 लोग मारे गए थे और 12 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।मरने वालों में 16 बच्चे और चार रेलवेकर्मी भी शामिल थे। इस धमाके में मरने वालों में ज़्यादातर पाकिस्तानी नागरिक थे। 26 जुलाई 2010 में जब ये मामला एनआईए को सौंपा गया तब जाँच एजेंसी ने दावा किया था कि उनके पास दक्षिणपंथी संगठन से जुड़े स्वामी असीमानंद के ख़िलाफ़ पुख़्ता सबूत हैं और वो ही इस मामले में मास्टरमाइंड थे।
जाँच एजेंसी का कहना था कि ये सभी अक्षरधाम (गुजरात), रघुनाथ मंदिर (जम्मू), संकट मोचन (वाराणसी) मंदिरों में हुए इस्लामी आतंकवादी हमलों से दुखी थे और ‘बम का बदला बम से’ लेना चाहते थे।
 
इन धमाकों के सिलसिले में आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार से भी पूछताछ की गई थी।
पहली चार्जशीट में नाबा कुमार उर्फ़ स्वामी असीमानंद के साथ-साथ सुनील जोशी, रामचंद्र कालसंग्रा, संदीप डांगे और लोकेश शर्मा का भी नाम था।इनपर आरोप था कि इन्होंने मिलकर ही देसी बम तैयार किए थे।
सीबीआई ने 2010 में उत्तराखंड के हरिद्वार से असीमानंद को गिरफ़्तार किया गया था और असीमानंद के ख़िलाफ़ मुक़दमा उनके इक़बालिया बयान के आधार पर ही बनाया गया था लेकिन बाद में वो ये कहते हुए अपने बयान से मुकर गए कि उन्होंने वो बयान टॉर्चर की वजह से दिया था।
इस मामले की सुनवाई धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है क्योंकि एनआईए को पाकिस्तान के उन 13 गवाहों का इंतज़ार है जो इन धमाकों के चश्मदीद रहे।
 
5)दो बार के मालेगांव विस्फोट:
महाराष्ट्र के नासिक ज़िले के मालेगांव में 8 सितंबर 2006 को जुमे की नमाज़ के ठीक बाद कुछ धमाके हुए और इनमें 37 लोगों की मौत हुई।
मुंबई पुलिस के आतंकवाद निरोधी दस्ते ने इस मामले की जाँच की और सात लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया। इसमें दो पाकिस्तानी नागरिकों का नाम भी था।
लेकिन राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) की चार्जशीट में एटीएस और सीबीआई के दावे ग़लत साबित हुए।
एनआईए ने अपनी जाँच के अनुसार चार लोगों को गिरफ़्तार किया जिनके नाम थे लोकेश शर्मा, धन सिंह, मनोहर सिंह और राजेंद्र चौधरी।
इसी दौरान मालेगांव शहर के अंजुमन चौक तथा भीकू चौक पर 29 सितंबर 2008 को सिलसिलेवार बम धमाके हुए जिनमें 6 लोगों की मौत हुई और 101 लोग घायल हुए थे।
       रमज़ान के महीने में हुए इन धमाकों की शुरुआती जाँच महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते ने की थी।
उनके मुताबिक़, इन धमाकों में एक मोटरसाइकिल इस्तेमाल की गई थी जिसके बारे में ये ख़बरें आईं थीं कि वो मोटरसाइकिल साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के नाम पर थी।
जाँच एजेंसियों के मुताबिक़, मालेगांव ब्लास्ट को कथित तौर पर अभिनव भारत नामक दक्षिणपंथी संस्था ने अंजाम दिया था।
इस मामले में अभियुक्त बनाए गए कर्नल श्रीकांत पुरोहित का संबंध इस संस्था से बताया गया था।
इस मामले में साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित समेत सात अन्य लोग अभियुक्त थे।बाद में इस मामले की जाँच की ज़िम्मेदारी एनआईए को सौंप दी गई थी।
       एनआईए ने भी कहा था कि कर्नल पुरोहित ने गुप्त बैठकों में हिस्सा लेकर धमाकों के लिए विस्फ़ोटक जुटाने की सहमति दी थी।
हालांकि पुरोहित कोर्ट में ख़ुद के राजनीति का शिकार होने का दावा पेश करते रहे।
हालांकि 13 मई 2016 को एनआईए की नई चार्जशीट फाइल हुई। इसमें रमेश शिवाजी उपाध्याय, समीर शरद कुलकर्णी, अजय राहिरकर, राकेश धावड़े, जगदीश महात्रे, कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित, सुधाकर द्विवेदी उर्फ स्वामी दयानंद पांडे सुधाकर चतुर्वेदी, रामचंद्र कालसांगरा और संदीप डांगे के ख़िलाफ़ पुख़्ता सबूत होने का दावा किया गया।
जबकि साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, शिव नारायण कालसांगरा, श्याम भवरलाल साहू, प्रवीण टक्कलकी, लोकेश शर्मा, धानसिंह चौधरी के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने लायक पुख़्ता सबूत नहीं होने का दावा किया।
      अप्रैल 2017 में बांबे हाईकोर्ट ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को जमानत दे दी, लेकिन कोर्ट ने श्रीकांत पुरोहित को जमानत नहीं दी।
अगस्त 2017 में कर्नल पुरोहित 9 साल बाद जेल से बाहर आए।जब कर्नल पुरोहित जेल से निकले तो सेना की तीन गाड़ियाँ उन्हें जेल से लेने पहुंचीं थी।
दिसंबर 2017 में मालेगांव ब्लास्ट मामले में साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित पर से मकोका (महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण क़ानून) हटा लिया गया है।दोनों पर अब यूएपीए और आईपीसी के तहत मुकदमा चल रहा है
 
(यह कहानी साध्वी प्रज्ञा द्वारा यूपी जागरण न्यूज (वैब चैनल)को राम मनोहर लोहिया इंस्टीटूट ऑफ मेडिकल साइंस में दिये गए साक्षात्कार व अतीत की छानबीन पर आधारित!साध्वी प्रज्ञा को नमन -अरुण कुमार सिंह-सम्पादक )
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