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प्रेम और ध्यान से पैदा होता है जीवन का संगीत

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ओशो
जीवन में हमेशा अतियां हैं और अतियों के बीच एक समन्वय चाहिए. दिन भर तुमने श्रम किया, रात विश्राम किया और सो गये. असल में जितना गहरा श्रम करोगे, उतनी ही रात गहरी नींद आ जायेगी. यह बड़ा अतर्क्य है. तर्क तो यह होता कि दिनभर आराम करते, अभ्यास करते आराम का, तो रात गहरी नींद आनी चाहिए थी. मगर जीवन विपरीत चलता है.
दिन भर श्रम किया, वह रात सोएगा. इसलिए अमीर आदमी अगर अनिद्रा से बीमार रहने लगता है, तो कुछ आश्चर्य नहीं. तुमने देखा होगा, सड़क पर भी मजदूर सो जाते हैं. भरी दुपहरी में! कोई अपनी ठेलागाड़ी के ही नीचे पड़ा है और सो रहा है और मस्त घुर्रा रहा है! और उसी के पास खड़े महल में कोई वातानुकूलित भवन में सुंदर शैयाओं पर रातभर करवटें बदलता है.
नींद नहीं आती. गरीब को अनिद्रा कभी नहीं सताती. गरीब और अनिद्रा का मेल नहीं है. और अमीर को अगर अनिद्रा न हो, तो समझना कि अमीरी में अभी कुछ कमी है.
 श्रम और विश्राम का तालमेल है. रात और दिन का तालमेल है. जीवन और मृत्यु, दोनों साथ-साथ हैं. एक श्वास भीतर गयी, तो एक श्वास बाहर जाती है. एक श्वास बाहर गयी, तो फिर एक श्वास भीतर आती है. तुम अगर कहो कि मैं भीतर ही रखूं श्वास को, तो मुश्किल हो जायेगी. ऐसा ही स्मरण और विस्मरण का मेल है. ऐसे ही ध्यान और प्रेम का मेल है.
 ध्यान और प्रेम दो प्रक्रियाएं हैं. प्रेम में दूसरे का स्मरण रहता है, ध्यान में स्वयं का. तुम चौबीस घंटे स्वयं का स्मरण करोगे तो थक जाओगे. थोड़ी-थोड़ी देर को दूसरे का स्मरण भी आ जाना चाहिए. उतनी देर विश्राम मिल जाता है. फिर से स्वयं का स्मरण आयेगा.
 जब कोई सामने मौजूद है, तो भूलो अपने को. पूरी तरह उसमें डूब जाओ! यह घड़ी प्रेम की है. ध्यान को प्रेम में डुबाे दो. जब कोई नहीं, अकेले बैठे हैं, तब फिर प्रेम को ध्यान में उठा दो, फिर ध्यान को पकड़ लो. एकांत में ध्यान, संग-साथ में प्रेम- दोनों के बीच डोलते रहो. इन दोनों के बीच जितनी सुगमता से यात्रा होगी, उतना ही आत्मविकास होगा.
जीवन का पेंडुलम हमेशा बायें-दायें जा रहा है. इसी के सहारे जीवन चलता है. हर चीज में इन दो अतियों के बीच एक तालमेल है. संगीत पैदा होता है ध्यानी से और शून्य के मिलन से. ऐसे ही जीवन का संगीत पैदा होता है प्रेम और ध्यान से. दोनों को संभालो! जब अकेले तब ध्यान में, जब कोई मौजूद हो तब प्रेम में.
 मैं चाहता हूं कि तुम पूरे मनुष्य हो जाओ. पृथ्वी पर जितने धर्म रहे हैं, उन्होंने मनुष्य की समग्रता पर जोर नहीं दिया. एक पंख काट दिया, एक ही पंख बचा लिया. मगर फिर उड़ना बंद हो जाता है.
यह पृथ्वी बहुत धन्यभागी हो सकती है, अगर दोनों पंख हों. उन पंखों का नाम है-  ध्यान और प्रेम. दोनों को संभालो! दोनों के बीच एक तारतम्य, एक छंद पैदा करो. वही समाधि है. वही ब्रह्म-अनुभव है.
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(ओशोधारा से रुपाली सक्सेना द्वारा संकलित !)

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