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आजादी के महानायक सुभाष बाबू के जन्मदिन पर विशेष….

आजादी के महानायक सुभाष बाबू के जन्मदिन पर विशेष….

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अरुण कुमार सिंह (संपादक )



आज नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म दिन है इस पावन अवसर पर 

राष्ट्रपिता महात्मा सुभाष चन्द्र बोस को कोटि कोटि प्रणाम

स्वाधीनता के पुजारी- सुभाषचंद्र बोस 
जन्म और परिवार 
           
सुभाष बाबू के वंश का मूल निवास स्थान बंगाल का ‘२४ परगना’ जिला है, पर उनके पिता श्री जानकीनाथ बहुत वर्षों तक कटक (उडी़सा) में काम करते रहे और वहीं २३ जनवरी, १८९७ को उनका जन्म हुआ। उनके पिता आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा के विशेष पक्षपाती थे, इसलिए उन्होंने अपने सब बच्चों को आरंभ से ही कटक के ‘योरोपियन स्कूल’ में शिक्षा दिलवाई और बाद में योरोप भेजकर उच्च शिक्षा की व्यवस्था की। सुभाष ने भी मैट्रिक तक की शिक्षा कटक में ही पाई, उसके पश्चात् कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिल होकर बी॰ ए॰ पास किया।

इसी बीच में एक बार वे किसी आध्यात्मिक गुरु की खोज में घर से बिना कहे चले गये और हरिद्वार, वंदावन, काशी, बुद्ध गया आदि स्थानों में घूम- फिरकर वापस आ गये इस यात्रा में उनको यही अनुभव हुआ कि इस समय देश में आध्यात्मिकता का ऊपरी ढाँचा मात्र रह गया है, इसका सार तत्व निकल गया है। जितने भी साधु- संन्यासियों से वे मिले, उन सबने उनको छोटे- बडे़ ग्रंथों में पढी़ हुई बातें तोते की तरह सुना दीं, पर व्यावहारिक जीवन में उनका कोई लक्षण न दिखाई दिया; और न देश, काल के अनुसार कोई महत्वपूर्ण कार्य करने की प्रवृत्ति किसी में जान पडी़।      

     घर लौटने पर माता को इन्होंने बडी़ दुःखित अवस्था में देखा। इनके बिना कुछ कहे- सुने चले जाने और बहुत ढूँढ़ने पर भी उन्हें पता न लगने पर वह शोक से बीमार हो गई थी। उन्होंने बडे़ क्षोभ से कहा- “तूने मेरी मृत्यु के लिए ही जन्म लिया था।” इन्होंने बहुत समझा- बुझाकर और फिर ऐसा काम न करने की प्रतिज्ञा करके उन्हें शांत किया। पिता का व्यवहार बहुत सहानुभूतिपूर्ण था। शोक तो उनको भी कम नहीं हुआ था, पर वे अपने पुत्र के उच्च विचारों और धर्म- भावना का मूल्य समझते थे। उन्होंने सुभाष के कार्य को बुरा नहीं कहा, पर उनकी सम्मति थी कि धर्म- साधन संसार में रहकर भी हो सकता है।

फिर यदि संसार- त्यागकर संन्यासी जीवन व्यतीत ही करना हो तो उसके लिए कुछ तैयारी भी करना आवश्यक है कि पहले सांसारिक कर्तव्यों का पालन करके और जीवन का अनुभव प्राप्त करके संन्यास के मार्ग पर पैर रखा जाये। सुभाष बाबू ने पिता की बातों को बडी़ श्रद्धा और सम्मान के साथ सुना और फिर अपना मत इस प्रकार व्यक्त किया- 
(१) संसार में रहकर भी धर्म किया जा सकता है, पर सबके लिए एक ही नियम काम नहीं दे सकता, क्योंकि सबका योग और सामर्थ्य एक समान नहीं होता। अतएव प्रत्येक को उसकी प्रकृति और प्रवृत्ति के अनुसार ही मार्ग बतलाना पड़ता है। 
(२) त्याग के लिए अभ्यास और तैयारी की बात ठीक है, पर विभिन्न लोगों के संस्कार पृथक्- पृथक् होते हैं और त्याग का आधार मुख्यतः मनुष्य के संस्कारो पर ही होता है। 
(३) कर्तव्य का निर्णय भी सापेक्ष दृष्टि से करना पड़ता है। उच्च कर्तव्य- पालन की आवश्यकता उपस्थित होने पर निम्न कर्तव्य को दबा देना पड़ता है। 
              पिता ने फिर पूछा कि- “शस्त्रों में जो कहा गया है कि ‘ब्रह्म- सत्य जगत् मिथ्या’- इसके संबंध में तुमने क्या समझा है?” सुभाष ने कहा- “जब तक यह बात केवल मुख से कही जाती है तब तक वह एक सिद्धांत मात्र है, पर जब उसके अनुसार व्यवहार किया जाता है तब वह ‘सत्य’ है और उसे व्यवहार में लाया जा सकता है। जिन्होंने इस वाक्य को प्रचारित किया था, वे उसके अनुसार चलते भी थे और वे कह गये हैं कि अन्य सब लोग भी इस पर चल सकते हैं।” जब पूछा गया कि- “इसको कौन व्यवहार में लाया था और उसका प्रमाण क्या है?” तो सुभाष ने उत्तर दिया- “प्राचीन ऋषि इस सिद्धांत के अनुसार आचरण करते थे। उन्होंने जो कहा है कि- “वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम” (मैं उस परमपुरुष को जानता हूँ)- यही इसका प्रमाण है। इस समय भी विवेकानन्द ने इस आदर्श को कार्यान्वित किया है और वही मेरा आदर्श है।” इस प्रकार पिता ने उस नवीन अवस्था में ही पुत्र की आत्म- त्याग और आत्म- समर्पण की मनोवृत्ति का परिचय प्राप्त कर लिया।

नेताजी को भारत में अपार जनसमर्थन प्राप्त था। नेताजी के रहते नेहरू का प्रधानमंत्री बनना असंभव था।जवाहरलाल नेहरू ने रूसी तानाशाह स्टालिन के ज़रिए करवाई थी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हत्या। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नेताजी को वॉर क्रिमिनल घोषित कर दिया गया तो एक फर्जी सूचना फ्लैश कराई गई कि प्लेन क्रैश में नेताजी की मौत हो गई।

आजादी के महानायक सुभाष बाबू के जन्मदिन पर विशेष….

बाद में वह शरण लेने के लिए रूस पहुंचे, लेकिन वहां तानाशाह स्टालिन ने उन्हें कैद कर लिया। स्टालिन ने नेहरू को बताया कि नेताजी उसकी कैद में हैं क्या करें? अंग्रेज़ों के प्रति अपनी स्वामिभक्ति दर्शाते हुए नेहरू ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली को पत्र भेज कर इसकी सूचना दे दी और कहा कि “आपका युद्ध अपराधी(नेताजी) रूस में है।” साथ ही नेहरू ने स्टालिन को इस पर सहमति दे दी कि नेताजी की हत्या कर दी जाए।’ नेहरू का निर्देश पाते ही स्टालिन ने नेताजी को साइबेरिया के श्रम-कारावास ‘गुलाग’ में भेज दिया, जहाँ भयंकर ठण्ड में अमानवीय यातनाएं झेलते हुए नेताजी की मृत्यु हो गई।कम्युनिस्ट सोवियत संघ के श्रम-कारावास को गुलाग कहते हैं।

यहाँ से किसी का ज़िंदा बच पाना लगभग असंभव था। श्रम-कारावास वही दंड प्रणाली है जिसे पुरानी भारतीय क़ानूनी भाषा में “क़ैद-ए-बामुशक्कत” और अनौपचारिक भाषा में “पत्थर तोड़ने की सज़ा” कहा जाता था। यहाँ बंदियों को भारी अमानवीय यातनाएं दी जाती थी। यहाँ ज़्यादातर कम्युनिस्टों का विरोध करने वाले राजनैतिक बंदी हुआ करते थे। गुलाग प्रणाली का प्रयोग राजनैतिक विरोध कुचलने के लिए कई दशकों तक किया गया।

कम्युनिस्टों के राज में इन गुलागों में 8 करोड़ से ज्यादा लोगों की मृत्यु हुई थी।’उस वर्ष 1945 में ताइवान में कहीं भी कोई हवाई दुर्घटना न तो दर्ज है और न ही बोस का नाम मृतकों की सूची में शामिल है। जवाहरलाल नेहरू के तत्कालीन स्टनॉग्रफर श्यामलाल जैन मेरठ के ही थे। उन्होंने खोसला कमिशन के सामने अपने बयान में बताया था कि रूस के प्रधानमंत्री स्टालिन ने संदेश भेजा था कि ‘सुभाष चंद्र बोस हमारे पास हैं, उनके साथ क्या करना है?’ उन्होंने बताया था कि इस पत्र का जवाब नेहरू ने आसिफ अली के घर बुलाकर उनसे ही लिखवाया था।’भारत के जन नायक की हत्या जैसे देशद्रोही कृत्य कर के नेहरू बना था भारत का प्रधानमंत्री।

जब राष्ट्रपिता महात्मा सुभाष चन्द्र बोस के विषय में लिखने बैठा तो यह तय नही कर पा रहा था कि इस विराट व्यक्तित्व के बारे में कहां से लिखना प्रारम्भ करुं, एक दिन तो इसी में चला गया क्योंकि नेता जी का बहुत ही विशाल व्यक्तित्व है
नेता जी के विशालता का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं*सुभाष बाबू संसार के ऐसे इकलौते क्रान्तिकारी नेता हैं जिनकी सेक्रेट फाईल भारत में तो छोड़ो भारत में हर महत्तवपूर्ण मंत्रालय के पास है जैसे–आईबई, रा (Raw), विदेश मंत्रालय तथा प्रधानमंत्री कार्यालय में तो है, ही इसके अलावा नेता जी की सेक्रेट फाइल  रुस, जर्मनी, जापान,ब्रिटेन तथा अमेरिका के पास भी है!

आजादी के महानायक सुभाष बाबू के जन्मदिन पर विशेष….

एक उदाहरण और देना चाहुंगा नेता जी के विशालतम व्यक्तित्व का*जिन जिन तानाशाहों से दुनियां कांपती थी वह तानाशाह नेता जी का सहयोग व सम्मान दिया**चाहे जर्मनी का तानाशाह हिटलर हो या इटली का तानाशाह मुसुलोनी या फिर रुस का स्टालिन*
चलो मुद्दे पर आते हैं बहुत उधेड़ बुन के बाद मैने यह तय किया कि   यह लेख नेता जी के जीत व मोहनदास करमचन्द गांधी की करारी हार पर ही शुरु करते हैं
1938 में एक मत से नेता जी हरिपुर कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गये तेज तर्रार नेता जी ठोस शैली योजना के बारे में बोले, और उसी समय नेता जी ने राष्ट्रीय योजना समिति बनाई पर नेता जी का यह क्रान्तिकारी कदम शायद मोहनदास करमचन्द गांधी को जंचा नहीऔर कारण यह था कि सुभाष बाबू की लोकप्रियता कांग्रेस में बढ़ती जा रही थी

आजादी के महानायक सुभाष बाबू के जन्मदिन पर विशेष….

नेता जी के प्रति गांधी की दुर्भावना 1939 प्रगट हुई, जब पुन: कांग्रेस अधिवेशन का चुनाव हुआ, गांधी अपने एक सिपहसालार पट्टाभि सितारमैया को चुनावी अखाड़े में उतार दियाऔर सुभाष बाबू से गांधी ने कहा कि आप चुना मत लड़ो, नेता जी ने कहा ऐसे कैसे हो सकता है चुनाव तो मैं लड़कर रहुंगा
मित्रों एक बात यहां बताना बेहद जरुरी है यह वह दौर था जब सुभाष बाबू के व्यक्तित्व के सामने नेहरु और गांधी सिर्फ बौने नही बहुत बौने थे यह दोनो सुभाष बाबू के आगे कहीं नही ठहरते थे, शायद यही कारण है जिससे गांधी   सुभाष बाबू से ईर्ष्या करने लगे थे क्योंकि गांधी की अस्तित्व सिमटती जा रही थी नेता जी के आगे!

आते हैं अब उस चुनाव पर*गांधी ने अपने सिपहसालार पट्टाभि सितारमैया को जिताने के लिए एड़ी चोटी का बल लगा दिया  फिर भी गांधी का सिपहसालार हार गया*और नेता जी की प्रचंड जीत हुई
चुनाव हारने के बाद ईर्ष्यालु गांधी का पहला बयान यह था      “यह पट्टाभि सितारमैया की नही हमारी (गांधी की) की हार है
गांधी व्यथित हो गये कि सुभाष बााबू कैसे जीत गये*चुनाव हारने के बाद गांधी अपनी दोगलई पर उतर आए और नेता जी की बगावत करने लगे*
गांधी ने अपने साथियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि आप लोग कांग्रेस से इस्तीफा दे दो इसके बाद कार्यकारिणी के 14 सदस्यों में से गांधी के 12 चमचे सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया*
मोहन दास करमचन्द गान्धी के इस घटियापन से सुभाष बाबू बेहद दु:खी हो गयेकुछ दिन बाद स्वत: नेता जी ने न सिर्फ कांग्रेस के अध्यक्ष पद से बल्कि कांग्रेस से भी 29 अप्रैल  1939 को इस्तीफा दे दिया!
यह घटना इतिहास के पन्नों में इस प्रकार दर्ज है–   ” इसमें बोस की नैतिक जीत व गांधी की नैतिक हार है,  क्योंकि गांधी ने लोकतांत्रिक ढंग से विजयी हुए एक अध्यक्ष को कार्य नही करने दिया*
कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद नेता जी ने 3 मई, 1939 को आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक के नाम से राष्ट्रवादी राजनीतिक दल की स्थापना की
मां भारती को आजाद कराने के लिए नेता जी तन्मयता से अपने कार्य में लगे रहे26 जून, 1940 को नेता जी की मुलाकात वीर सावरकर से होती है, वीर सावरकर ने नेता जी को सलाह दिया कि अंग्रेजो के खिलाफ एक भारतीय सेना खड़ी करो तब आपको शिघ्र अपनी मंजिल मिल जायेगीऔर मां भारती को शिघ्र आजाद करा पाओगे क्योंकि मैं आपके अंदर देशभक्ति का धधकता ज्वालामुखी देख रहा हुं
वीर सावरकर ने नेता जी को रास बिहारी बोस का पत्र दिखाया और कहा कि रास बिहारी बोस मां भारती को आजाद कराने के लिए आजाद हिंद फौज का गठन किया है**मैं चाहता हुं आप वहां जाकर* *आजाद हिंद फौज का नेतृत्व करो*सुभाष बाबू बोले ठीक है
आ गई वह शुभ घड़ी जब मां भारती को आजाद कराने का सपना संजोए नेता जी जर्मनी जाने के लिए अंग्रेजो के नजरबंद को धता देते हुए घर से निकल गये
17 जनवरी,1941 को शीत से सिहरती उस रात 3 बजे जब समूचा देश बेसुध बना देने वाली नींद की बांहो में बेहोश थाऔर पवित्र सागर संगम के पावन जल से निमज्जित होकर लौट रहे लाखो लाख तीर्थयात्री सड़कों तथा घाटों पर कंबल कथरी में लिपटे सो रहे थेतब कलकत्ता के एलगिन रोड पर बनी एक प्रशस्त कोठी से एक कार समसनाती हुई निकली थी और तेज रफ्तार से सड़को पर छाए हल्को कुहासो में गुम हो गई थी
कार की पिछली सीट पर नेता जी मुसलमान के भेष में बैठे थेरात भर कार चली भोर में धनबाद पहुंच गयेएक कोठी के सामने गाड़ी रुकी, नेता जी उर्फ जियाउद्दीन खां को बाहर वाले कमरे में ठहराया गया, यह बंग्ला शरत चन्द्र बोस के बड़े बेटे अशोक बोस का था
अशोक बोस का वह बयान जो “परवर्ती युग”  युग में उस समय छपा थाउसे उधृत कर रहा हुं—बकौल अशोक बोस—— 18 जनवरी, 1941 की सुबह छह (6) बजे पत्नी के साथ जब मैं नास्ते के लिए तैयार हो रहा था कि मेरे भाई शिशिर बोस पिताजी की एक गाड़ी से मेरे कोठी पर आएहम लोगों से उन्होने बतलाया कि कलकत्ता से रांगू काका (सुभाष चन्द्र बोस) को लेकर आए हैं
वो दिन भर हमारे पास ही रहे शाम को पठान के भेष में वे हमले झूठ मूठ का विदा लेकर चले गयेहमसे विदा लेते समयरांगा काकू की आँखो में आंसू थे,शायद उन्हे लग रहा था कि वे अब वापस नही आएंगे
*नेता जी ने सिंगापुर में 21 अक्टुबर,1943 में आर्जी हुकुमत-ए-आजाद हिंद अर्थात आजाद हिंद सरकार की स्थापना की*
इंडिययन इंडिपेंडेंस लीग के विराट सम्मेलन में नेता जी ने लगभग डेढ़ घंटे तक भाषण देते हुए आजाद हिंद सरकार के अहमियत पर रोशनी डाली!
नेता जी परमेश्वर के नाम पर सब लोगों से भारत भक्ति की शपथ ली और कहा कि–मैं सुभाष चन्द्र बोस भारत और 38 करोड़ भारतियों को स्वतंत्र कराने की शपथ लेता हुंअपने अंतिम सांस तक स्वतंत्रता के इस पुनित संग्राम को चलाता रहुंगा!
*आजाद हिंद सरकार ऐसी वैसी सरकार नही थी एक सुव्यवस्थित सरकार थी!

ऐस थी आजाद हिंद सरकार की रुप रेखा—-
*सुभाष चन्द्र बोस*(राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, युद्ध एवं विदेश मंत्री)
*रास बिहारी बोस*(उच्चतम परामर्शदाता)
*सरदार इदार सिंह*(परामर्शदाता)
*ए.एन.सरकार*(कानूनी सलाहकार)
*कैप्टन श्रीमति लक्ष्मी*(महिला संगठन)
*एस ए अय्यर*(प्रचार एवं प्रसारण)
*लेफ्टिनेन्ट कर्नल ए.सी.चटर्जी*(वित्त)
ले. कर्नल अजीज अहमद, ले. कर्नल एस. एस. भगत, ले. कर्नल जे. के. भोसले,  ले. कर्नल गुलजार सिंह,  ले. कर्नल एम. जेड. कियानी,  ले. कर्नल ए.डी. लोगनादन,  ले. कर्नल एहसान कादरी, ले. कर्नल शाहनवाज खां (सशस्त्र सेना के प्रतिनिधि)एम.एस. सहायक सचिव (मंत्री स्तर)करीब गनी, देवनाथ दास, डी.एम खां, ए. चलप्पा, जे. थीवी इत्यादि ।सिंगापुर में नेता जी भारतीय स्वतंत्रता के 24 मुख्यालय बनाए थे

*रंगून में भारतीय स्वतंत्रता लीग के मुख्यालय में 24 विभाग थे–**वित्त,  लेखा परिक्षण, नेता जी फंड समिति, आपुर्ति, आपुर्ति बोर्ड, क्रय बोर्ड, माल विभाग,  भर्ती एवं प्रशिक्षण, महिला विभाग*,  *प्रचार एवं प्रसार, शिक्षा,  स्वास्थ्य एवं समाज कल्याण,* *राष्ट्रीय योजना,  गुप्तचर विभाग, सूचना विभाग,  उत्पादन, प्रौद्योगिकी, संचार,*  *कृषि एवं उद्योग, पुनर्निर्माण,  आवास एवं परिवहन विभाग, विदेश, श्रम और शाखाएं*
*आजाद हिंद फौज के तमगे इस प्रकार थे—–**

 शेर-ए-हिंद**

 सरदार-ए-जंग**

वीर-ए-हिंद**

सेवक-ए-हिंद**

शहीद-ए-भारत
संसार के सम्मुख आजाद हिंद सरकार की घोषणा करने के बाद भारत के प्रति निष्ठा की शपथ ली गईजब नेता जी अपनी शपथ पढ़ने लगे तो वातावरण निस्तब्ध थानेता जी ने कहा  -‘मैं सुभाषचन्द्र बोस इश्वर के नाम पर यह पावन शपथ लेता हुं कि भारत व उसके 38 करोड़ निवासियों को स्वतंत्र कराऊंगा…….
इतना कहने के बाद नेता जी रुक गये, क्योंकि उनकी वाणी भावनाओं के कारण अनरुद्ध हो गईअश्रुधारा उनके गालो पर बह निकलीनेता जी ने अपना रुमाल निकालकर आंसू पोंछे सम्पूर्ण हाल में एकदम स्तब्धता छा गईउनके दु:ख व भावनाओं से अधिकांश उपस्थित व्यक्ति उद्वेलित हो उठे और उनके आँखो से भी आंसू बह निकले
उस समय नेता जी यह भूल गये कि श्रोता उनके सामने हैंभावनाओ से अभिभूत नेता की वाणी अवरुद्ध हो गई और आगे ना पढ़ सकोभावना मुक्त होने पर धैर्य  आया और उन्होने पढ़ना आरम्भ किया—*मैं सुभाष चन्द्र बोस अपने जीवन की अंतिम सांस तक* *स्वतंत्रता की लड़ाई जारी रखुंगा*मैं सदैव भारत का सेवक रहुंगा और 38 करोड़ भाइयों बहनो के कल्याण को अपना सर्वोच्च कर्तव्य समझुंगा ।
*23 अक्टूबर 1943 की आधी रात को आजाद हिंद सरकार ने ब्रिटेन व अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी*
जापान ने 23 अक्टुबर को ही आजाद हिंद सरकार को मान्यता दे दी24 अक्टूबर को वर्मा ने आजाद हिंद सरकार को मान्यता दी30 अक्टूबर 1943 को जर्मनी व फिलीपींस ने आजाद सरकार को मान्यता दी1 नवम्बर को चीन व मनचुको ने आजाद हिंद सरकार को मान्यता दी9 नवम्बर को इटली ने आजाद हिंद सरकार को मान्यता दी21 नवम्बर को थाईलैंड ने आजाद हिंद सरकार को मान्यता दी27 दिसम्बर 1943 को क्रोशिया ने आजाद हिंद सरकार को मान्यता दी
*जनरल तोजो ने 10 नवम्बर को अंडमान निकोबार का शासन भार आजाद हिंद को सौंप दिया नेता जी ने दोनो द्वीपो का नामकरण क्रमश: शहीद व स्वराज किया*
नेता जी के नेतृत्व में आजादी के दीवाने मां भारती के वीर लाडले आजाद हिंद फौज के सिपाही युद्ध में कुद पड़े
मार्च 1944 में इंफाल तथा अप्रैल 1944 में कोहिमा पर आजाद हिंद फौज ने धावा बोल दिया आजाद हिंद फौज के मतवाले सिपाहियों ने कोहराम मचा दिया अंग्रेजों को खदेड़ खदेड़ कर मारा ऐसा ताण्डव मचाया कि अंग्रेजो के पांव उखड़ गये
21 मार्च 1944 को नेता जी अपने मुख्यालय में आयोजित प्रेस कान्फ्रेंस में ऐलान किया कि जापानी सेना के कंधे से कंधा मिलाकर लड़ती हुई आजाद हिंद फौज 18 मार्च को भारत में प्रवेश कर चुकी है, अब युद्ध भारतीय भूमि पर हो रहा है
आजाद हिंद फौज विजय पताका फहराते हुए आगे बढ़ रही थी
*अप्रैल के पहले हफ्ते में नेता जी ने अपने मंत्रिमंडल के सदस्य  ए.सी. चटर्जी को मुक्त क्षेत्र का नामजद गनर्नर नियिक्त किया*
*आजाद हिंद सरकार का प्रशासकीय खंड आजाद हिंद फौज के साथ साथ आगे बढ़ता मुक्त क्षेत्रों का शासन सम्भालने को तैयार था*
जापानी प्रधानमंत्री पहले ही घोषणा कर चुके थे कि भारत अधिकृत क्षेत्र जैसे जैसे अंग्रेजो से मुक्त होते जायेंगे वैसे वैसे इस क्षेत्र का शासन भार नेता जी के आजाद हिंद सरकार को सौंप दिये जायेंगे
एक वाकया और आपको बताता चलुं *जापान में सरकार बदलने के बाद अक्टूबर 1944 में सलाह* *मशविरा के लिए नेता जी को *टोक्यो आमंत्रित किया गया**जापान सरकार ने नेता जी को अपने सर्वोच्च अलंकरण से* *विभूषित करने का प्रस्ताव रखा* *लेकिन नेता जी यह कहते हुए* *प्रस्ताव ठुकरा दिया* *भारत के दासता मुक्त होने तक मैं कोई अलंकरण स्वीकार नही कर सकता*ऐसे थे हमारे नेता जी, गर्व है मां भारती के इस वीर लाडले कोरजनीश तिवारी राज की इतनी सामर्थ्य नही है कि नेता जी के विराट व्यक्तित्व का विस्तृत विवरण यहां सोशल मीडिया पर दे सकेंइसके लिए तो भारी भरकम किताब लिखना पड़ेगा फिर भी नेता जी के विशाल कद को शायद उसमें समाहित ना क्या जा सके 
नेता जी पर लिखने वाले यही सोचते हैं क्या लिखुं क्या छोड़ुं क्योंकि इस विराट व्यक्तित्व का हर पल हर क्षण रोमांचकारी हैफिर भी संक्षेप में बहुत कुछ आपके सामने रखने की कोशिश की
नेता जी के अन्य विभिन्न पहलुओं पर फिर चर्चा करेंगे आज बस इतना ही ।
मेरी तब लुलगती है साहब इतने के बाद जब कोई कहता है कि ‘दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल साबरमती के संत तुने कर दिया कमाल’*जी करता है कि ऐसा कहने वाले के मुंह पर दश जुता मारुं और पुछुं कि क्या कमाल गांधी ने  किया यह बता*
*मैं स्पष्ट रुप से कहना चाहुंगा भारत की आजादी में मोहनदास करमचन्द गांधी का कोई योगदान नही है*
इतिहास के प्रेमी मित्र इतिहास के पन्नो को पलटेंगे तो मालुम होगा कि गांधी अपना हर आंदोलन बीच में ही बंद करके भाग खड़े होते थेगांधी का आखिरी आंदोलन था अंग्रेजो भारत छोड़ो 1943 में यह भी पुरी तरह से फेल हो चुका था अंग्रेजो ने गांधी को जेल में डालकर ऐसी कुटाई की कि जेल से रिहा होने के बाद गांधी बुत्त हो गये थे
1943 में गांधी का आंदोलन असफल रहा उसके बाद वह मौन हो गये और सत्ता का हस्तानान्तरण 1947 में हुआ तो इसमें कहां गांधी का योगदान है ??
जो लोग कहते हैं कि दे दी हमे आजादी बिना खड्ग बिना ढाल दरअसल वो हमारे शहीदों का अपमान कर रहे हैं
*आजाद हिंद फौज में साठ हजार जवान (रंग रुट) थे जिनमें से मां भारती को आजाद कराने के लिए दुश्मनों से घनघोर युद्ध करते हुए छब्बीस हजार (26000) जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी!पर कांग्रेस की निकम्मी सरकारों ने नेताजी अथवा आजाद हिंद फौज व आजाद हिंद सरकार की महिमामंडन करने के बजाय धुर्त गांधी का महिमामंडन किया और नेता जी की शौर्यगाथा इतिहास के पन्नों में दबकर रह गई
*मैं नमन करता हुं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जिन्होने नेता जी को वह सम्मान दिया जो वास्तव में बहुत पहले हो जाना चाहिए था*
आखिरी ऐतिहासिक तथ्य आपके सामने रखकर लेखनी को विराम देना चाहुंगागांधी के झूठ का पोल खोलने वाला कोई और नही बल्कि लार्ड क्लेंट ऐटली हैं यह वही एटली है जो  इंग्लैंड का प्रधानमंत्री था 1950 तकइसी के दस्तख्त से भारत को सत्ता मिली थी जिसे लोग आजादी कहते हैं अब इससे बड़ा गवाह कौन हो सकता है??
भारत की आजादी के कुछ समय बाद लार्ड क्लेंट ऐटली भारत आया बंगाल के तत्कालिन गवर्नर व न्यायाधीश पी. वी. चक्रवर्ती ने ऐटली से मुलाकात की मुलाकात के दौरान एक सवाल किया
चक्रवर्ती ने ऐटली से पुछा आपने इतनी जल्दी भारत कैसे छोड़ दिया ??क्या आप गांधी आंदोलन से डर गये थे ??क्योंकि आप तो 1945 में विश्वविजेता भी हो गये थे विश्वृुद्ध आपने जीत लिया था फिर ऐसी क्या मजबुरी आन पड़ी कि भारत छोड़कर जाना पड़ा आपको ???
*लार्ड क्लेंट ऐटली ने तीन शब्द बोला—-**आजाद हिंद फौज व नेता जी सुभाष चन्द बोस*
ऐटली ने कहा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस व आजाद हिंद फौज के कारण हमें भारत को छोड़ना पड़ा
और रही गांधी की बात तो हम लोग गांधी को गहराई से लेते ही नही थेउनके आंदोलन से हमारे सेहत पर कोई प्रभाव नही पड़ा
*ऐटली ने गांधी को Minimal (मिनिमल)*कहा था अब तो आप लोग समझ गये होंगे कि अंग्रेजो के नजर में गांधी की क्या औकात थी
आज नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म दिन हैइस पावन अवसर पर 
*राष्ट्रपिता महात्मा सुभाष चन्द्र बोस को कोटि कोटि प्रणाम

 जय हिन्द

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