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गणित के ध्रुव तारे श्रीनिवास रामानुजन:राष्ट्रीय गणित दिवस पर विशेष ramanuj

गणित के ध्रुव तारे श्रीनिवास रामानुजन:राष्ट्रीय गणित दिवस पर विशेष

रामानुजन ने गणित के ऐसे-ऐसे सिद्धांत दिए जिन्‍हें आज तक सुलझाया नहीं जा सका है. उनके फॉर्मूलों कई वैज्ञानिक खोजों में मददगार साबित हुए. उनके लिखे हुए कई थ‍ियोरम सिद्ध किए जा चुके हैं.

नई द‍िल्‍ली : भारत के महान गण‍ितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का आज जन्‍म दिन है. इस दिन को राष्‍ट्रीय गण‍ित द‍िवस के रूप में मनाया जाता है. बेहद साधारण परिवार में जन्‍म लेने वाले रामानुजन ने वो कर द‍िखाया जो शायद ही कोई कर पाए. बेहद कम उम्र में मैथ्‍स के थियोरम ल‍िखने वाले रामानुजन सिर्फ भारत के लिए ही नहीं पूरी दुनिया के लिए मिसाल हैं. उन्‍होंने गणित के ऐसे-ऐसे सिद्धांत दिए जिन्‍हें आज तक सुलझाया नहीं जा सका है. उनके फॉर्मूलों कई वैज्ञानिक खोजों में मददगार साबित हुए. उनके लिखे हुए कई थ‍ियोरम सिद्ध किए जा चुके हैं, लेकिन अब तक यह नहीं समझा जा सका है कि आख‍िर उन्‍होंने ऐसे जटिल फॉर्मूलों के बारे में सोचा कैसे होगा.


रामानुजन का जन्म 22 दिसम्बर 1887 के दिन उनके मामा के घर तमिलनाडु के इरोड में हुआ था। उनके पिताजी श्रीनिवास आयंगर तंजाऊर जिले के कुंभकोणम गांव में कपड़े की दुकान में मुनीम का कार्य करते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत सामान्य थी। उनकी माता कोमलताम्मल धार्मिक प्रवृति की एवं परम्परावादी महिला थीं।परिवार से मिले धार्मिक संस्कारों के कारण रामानुजन भी रोज सुबह पूजा-पाठ करते थे, हमेशा धोती पहनना, चोटी रखना आदि बातें उनके जीवन में दिखती थीं।

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अरुण कुमार सिंह (संपादक )

जब रामानुजन को प्रो. हार्डी के माध्यम से इंगलैंड जाने का निमंत्रण मिला तब उनकी माता ने स्पष्ट मना कर दिया, क्योंकि उस समय की मान्यताओं के कारण समंदर पार जाना अशुभ माना जाता था। उनकी माता का मानना था कि विदेश में लोग मांस, मदिरा का सेवन करते हैं तो मेरे बच्चे पर भी कुसंस्कार का प्रभाव पड़ेगा।उनकी माता की कुलदेवी नामगिरी में अत्यंत श्रद्धा थी। कुछ दिनों के बाद एक दिन सुबह उनकी माता ने कहा कि कल रात्रि में उनको कुलदेवी स्वप्न में आयी और उसमें उन्होंने रामानुजन को ससम्मान अंग्रेजो के बीच में बैठे देखा। बाद में कुलदेवी ने उनको आज्ञा दी की वह पुत्र की इच्छा विरूद्ध कुछ भी न करे। तब उनकी माताजी ने रामानुजन को इंग्लैंड जाने की अनुमति दी।

रामानुजन ने 13 वर्ष की उम्र से ही अनुसंधान कार्य शुरु किया था एवं 15 वर्ष की उम्र में स्वयं ने किये हुए कार्य को नोटबुक में लिखने की शुरुआत की थी। एक प्रकार से कहना है तो वह गणित को लेकर ही जन्मे थे, गणित के लिए ही जीवन भर समपर्ण भाव से कार्य किया और जीवन पर्यन्त वह इसी कार्य में लगे रहे। वे बहुत अधिक बीमार थे, उस समय प्रो. हार्डी उनसे मिलने के लिए गये।

जाते समय रास्ते में वह सोच रहे थे कि रामानुजन का स्वास्थ्य खराब होने के कारण आज गणित की कोई बात नहीं करुंगा। कुछ हल्की-फुल्की बातें करना अच्छा रहेगा। जब वे रामानुजन से मिले तो उन्होंने कहा कि मैं जिस टैक्सी से आया उसका नम्बर 1729 था जो अपशकुन संख्या है। रामानुजन ने तुरन्त कहा नहीं-2 ‘‘यह संख्या छोटी से छोटी संख्या है, जिसे दो भिन्न-2 रूपों में दो संख्याओं के घन के योग के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। वह इस प्रकार हैः- 1729 = 〖10〗^3+ 9^3= 〖12〗^3+ 1^3 । विख्यात गणितज्ञ प्रो. लिटिलवुड का ठीक ही कहना था कि रामानुजन प्रत्येक संख्या के मित्र थे।

यहां पर हम आपको रामानुजन की जिंदगी से जुड़ी ऐसी 10 बातों के बारे में बता रहे हैं, जिन्‍हें जानने के बाद आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा:

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भारत के महान गण‍ितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन

1. महान गण‍ितज्ञ श्रीन‍िवास रामानुजन का जन्‍म  22 दिसंबर 1887 को कोयंबटूर के ईरोड गांव के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनकी मां का नाम कोमलताम्‍मल और पिता का नाम श्रीनिवास अय्यंगर था. उनके जन्‍म के बाद पूरा परिवार कुंबाकोनम जाकर बस गया, जहां पिता श्रीनिवास एक कपड़े की दुकान में काम करने लगे. 

2. शुरू में रामानुजन सामान्‍य बच्‍चों की तरह ही थे. यहां तक कि तीन साल की उम्र तक उन्‍होंने बोलना भी शुरू नहीं क‍िया था. स्‍कूल में एडमिशन हुता तो पढ़ाने का घ‍िसा-पिटा अंदाज उन्‍हें बिलकुल भी नहीं भाया. हां, ये और बात है कि 10 साल की उम्र में उन्‍होंने प्राइमरी एग्‍जाम में पूरे जिले में टॉप किया. 15 साल की उम्र में वो ‘ए सिनॉपसिस ऑफ एलिमेंट्री रिजल्‍ट्स इन प्‍योर एंड एप्‍लाइट मैथमेटिक्‍स’ नाम की बेहद पुरानी किताब को पूरी तरह घोट कर पी गए थे. इस किताब में हजारों थियोरम थे. यह उनकी प्रतिभा का ही फल था कि उन्‍हें उन्‍हें आगे की पढ़ाई के लिए स्‍कॉलरश‍िप भी मिली. 

3. रामानुजन का मन सिर्फ मैथ्‍स में लगता था. उन्‍होंने दूसरे सब्‍जेक्‍ट्स की ओर ध्‍यान ही नहीं दिया. नतीजतन उन्‍हें पहले गवर्मेंट कॉलेज और बाद में यूनिवर्सिटी ऑफ मद्रास की स्‍कॉलरश‍िप गंवानी पड़ी. इन सबके बावजूद मैथ्‍स के प्रति उनका लगाव ज़रा भी कम नहीं हुआ. 1911 में इंडियन मैथमेटिकल सोसाइट के जर्नल में उनका 17 पन्‍नों का एक पेपर पब्‍लिश हुआ जो बर्नूली नंबरों पर आधारित था. 1912 में रामानुजन मद्रास पोर्ट ट्रस्‍ट में क्‍लर्क की नौकरी जरूर करने लगे थे लेकिन तब तक उनकी पहचान एक मेधावी गणितज्ञ के रूप में होने लगी थी. 

4. इसी दौरान रामानुजन उस समय के विश्‍व प्रसिद्ध ब्रिटिश गण‍ितज्ञ जीएच हार्डी के काम के बारे में जानने लगे थे. 1913 में रामानुजन ने अपना कुछ काम पत्र के जरिए हार्डी के पास भेजा. शुरुआत में हार्डी ने उनके खतों को मजाक के तौर पर लिया, लेकिन जल्‍द ही उन्‍होंने उनकी प्रतिभा भांप ली. फिर क्‍या था हार्डी ने रामानुजन को पहले मद्रास यूनिवर्सिटी में और फिर कैंब्रिज में स्‍कॉलरशिप दिलाने में मदद की. हार्डी ने रामानुजन को अपने पास कैंब्रिज बुला लिया. हार्डी के सानिध्‍य में रामानुजन ने खुद के 20 रिसर्च पेपर पब्‍लिश किए. 1916 में रामानुजन को कैंब्रिज से बैचलर ऑफ साइंस की डिग्री मिली और 1918 में वो रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन के सदस्‍य बन गए. 

5. भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था और ऐसे समय में किसी भारतीय को रॉयल सोसाइटी की सदस्‍यता मिलना बहुत बड़ी बात थी. रॉयल सोसाइटी के पूरे इतिहास में रामानुजन कम आयु का कोई सदस्य आज तक नहीं हुआ है. रॉयल सोसाइटी की सदस्यता के बाद वे ट्रिनीटी कॉलेज की फेलोशिप पाने वाले पहले भारतीय भी बने.

6. रामानुजन कड़ी मेहनत कर रहे थे. ब्रिटेन का ठंड और नमी वाला मौसम उन्‍हें सूट नहीं कर रहा था. 1917 में उन्‍हें टीबी भी हो गया. स्‍वास्‍थ्‍य में थोड़े-बहुत सुधार के बाद 1919 में उनकी हालत बहुत ज्‍यादा खराब हो गई और वो भारत लौट आए. 26 अप्रैल 1920 को 32 साल की बेहद कम उम्र में उनका देहांत हो गया. बीमारी की हालत में भी उन्‍होंने मैथ्‍स से अपना नाता नहीं तोड़ा. बेड पर लेटे-लेटे वो थियोरम लिखते रहते थे. पूछने पर कहते थे कि थ‍ियोरम सपने में आए
थे. 

7. रामानुजन के बनाए हुए ढेरों ऐसे थियोरम हैं जो आज भी किसी पहेली से कम नहीं हैं. उनका एक पुराना रजिस्‍टर 1976 में ट्रिनीटी कॉलेज की लाइब्रेरी से मिला था, जिसमें थियोरम और कई फॉर्मूले थे. इस रजिस्‍टर के थियोरम की गुत्‍थी आज तक नहीं सुलझ पाई है. इस रजिस्‍टर को रामानुजन की नोट बुक के नाम से जाना जाता है. 

8. रामानुजन को ईश्‍वर में अपार व‍िश्‍वास था. जब उनसे गण‍ित के फॉर्मूले की उत्‍पत्ति के बारे में पूछा जाता था तो वो कहते थे कि ईष्‍ट देवी नामगिरी देवी की कृपा से उन्‍हें यह फॉर्मूला सूझा. वे कहते थे, ‘मेरे लिए गण‍ित के उस सूत्र का कोई मतलब नहीं जिससे मुझे आध्‍यात्‍मिक विचार न मिलते हों.’

9. रामानुजन की बायोग्राफी ‘द मैन हू न्‍यू इंफिनिटी’ 1991 में पब्‍लिश हुई थी. इसी नाम से रामानुजन पर एक फिल्‍म भी बन चुकी है. इस फिल्‍म में एक्‍टर देव पटेल ने रामानुजन का किरदार निभाया है.

10. रामानुजन आज भी न सिर्फ भारतीय बल्‍कि व‍िदेशी गण‍ितज्ञों के लिए प्रेरणास्रोत हैं. 

स्वदेश वापस लौटने के बाद असाध्य बीमारी की अवस्था में भी उनकी गणित की साधना चलती रही। उनकी पत्नी जानकी देवी के शब्दों में कहें तो ‘‘वे पूरे समय पथारी में रहने के कारण उनकी पीठ एवं पैर में दर्द होता था। परन्तु उसकी परवाह किये बिना रामानुजन कहते थे कि मुझे तकिया लगाकर बिठा दो और बाद में स्लेट और पेन मांगकर गणित के अनुसंधान कार्य करने में मग्न हो जाते थे। मृत्यु के दो मास पूर्व (12 जनवरी 1920) को उन्होंने प्रो. हार्डी को अंतिम पत्र लिखा, उसमें भी उन्होंने ‘‘मॉक थीटा फंक्शन’’ पर मिले परिणामों को भेजा था।

विदेश जाने से पूर्व रामानुजन ने भी माता को वचन दिया कि वह भारतीय परम्परा एवं धर्म का पूर्ण रूप से पालन करेंगे और हमेशा शाकाहारी भोजन ही लेंगे। इसके बाद 17 मार्च 1914 को इंग्लैंड के लिए उन्होंने प्रस्थान किया।रामानुजन पढ़ाई में काफी आगे थे। इस हेतु विद्यालयीन शिक्षा के समय उनको कई पुरस्कार एवं छात्रवृतियां प्राप्त हुई थी। परंतु गणित में विशेष रुचि के कारण उस ओर अधिक ध्यान देने के परिणामस्वरूप 11वीं की परीक्षा में वे गणित छोड़कर सभी विषयों में अनुत्तीर्ण हो गए, लेकिन गणित में उनकी प्रतिभा देखकर उनके शिक्षक भी आश्चर्यचकित थे।

उन्होंने 16 वर्ष की आयु में विख्यात गणितज्ञ जी.एस. कार की पुस्तक में से ज्योमिति एवं बीजगणित के प्रमेय एवं सूत्र हल कर लिए थे। 25 वर्ष की आयु में त्रिघात एवं चतुर्घात समीकरण हल करने के तरीके खोज निकाले थे। उनके विद्यालय में 1200 छात्र थे, इस कारण से वहां के शिक्षकों को समय-सारणी बनाने में कठिनाई आती थी, वह कठिन कार्य रामानुजन ने सहजता से करके अपने वरिष्ठ सुब्बीयर को दिया।ग्यारहवीं की परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने के बाद परिवार की आवश्यकता के कारण वह टयूशन करने लगे, बाद में विवाह हो जाने के बाद उनको कई स्थानों पर नौकरी हेतु भटकना पड़ा। इस कारण से उनका गणित का कार्य भी प्रभावित होता था।

परन्तु उन 6 वर्ष के कठिन समय में उनकी डिप्टी क्लेक्टर रामस्वामी अय्यर, प्रो. पी.वी. शेषु अय्यर, सी.वी राजगोपालचारी, रामचन्द्र राव आदि विद्वानों से भेंट हुई और उन सभी के सहयोग से नौकरी के साथ-2 गणित का कार्य भी वह करते रहे।रामानुजन के जीवन में जिसकी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही वह कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रो. हार्डी की थी। उन्होंने जब रामानुजन का गणितीय शोध कार्य देखा तब वह आश्चर्यचकित रह गये।

उन्होंने रामानुजन को इंग्लैण्ड बुलाया और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज के फेलो के रूप में प्रवेश कराने, छात्रवृति दिलाने एवं अध्ययन तथा शोध कार्य में सब प्रकार से सहयोग किया। जिस रामानुजन को अपने देश में 11वीं कक्षा की उपाधि नहीं मिली थी, उनको विश्व का महान गणितज्ञ बनने में अपनी महत्ती भूमिका का निर्वाह किया।रामानुजन 1914 से 1919 के दरम्यान इंग्लैण्ड में रहे। उस दौरान उनके जीवन में काफी उतार-चढ़ाव आये। प्रथम विश्वयुद्ध के कारण गणित के कार्य में रुकावट, खान-पान में कठिनाई (क्योंकि रामानुजन पूर्णतः शाकाहारी थे) अत्यधिक ठंड के कारण बीमारी आदि समस्याओं के बीच भी उन्होंने 37 शोध-पत्र प्रस्तुत किये।रामानुजन को 19 मार्च 1916 को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से स्नातक की उपाधि दी गई। 6 दिसम्बर 1917 को ‘‘फेलो ऑफ़ लंदन मेथेमेटीकल सोसायटी’’ तथा फरवरी 1918 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के सदस्य के रूप में वह नियुक्त हुए। मई 1918 में ‘‘फैलो ऑफ़ रायल सोसायटी’’ बनने का सम्मान प्रथम भारतीय के रूप में प्राप्त हुआ। 13 अक्टूबर 1918 को वह ट्रिनिटी कॉलेज के फेलो चुने गये। इन घटनाओं से रामानुजन ने स्वयं को धन्यता का अनुभव किया। क्योंकि उनके गुरू के समान, प्रो. हार्डी भी इसी पद पर ट्रिनिटी कॉलेज में कार्यरत थे।

रामानुजन ने इंग्लैण्ड के पांच वर्ष के कार्यकाल में अनेक सम्मान प्राप्त किये, परन्तु उन्होंने जीवन में सरलता, सादगी और भारतीयता को यथावत बनाये रखा था। प्रो. के. आनन्दराव तो रामानुजन के समय में ही किंग्स कॉलेज में थे। उनके अनुसार इतनी प्रसिद्धि मिलने के बाद भी वे स्वभाव से विनम्र थे, रहन-सहन मे सादगी थी । रामानुजन विदेश में भी अपने लिए स्वयं ही भोजन बनाते थे। वे कहते थे, “यदि कोई गणितीय समीकरण अथवा सूत्र किसी भागवत विचार से मुझें नहीं भर देता, तो वह मेरे लिए निरर्थक है।’’ 

जब उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, लिखते समय कागज खत्म हो जाते थे तब लिखे हुए कागज पर लाल स्याही की मदद से सूत्र लिखने लगते थे। नौकरी के समय में पोर्ट ट्रस्ट के रास्ते में पड़े हुए कागज इकठ्ठे करके उपयोग करते थे। चेन्नै विश्वविद्यालय से जब उनको 250 रुपये की छात्रवृति स्वीकार हुई, तब उन्होंने रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर कहा की इसमें से मेरे घर का खर्च निकलने के बाद जो बच जाए वह गरीब विद्यार्थियों के सहायता कोष में जमा करा दें। 

वर्ष 2011 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने श्रीनिवास रामानुजन के 125 वें वर्ष निमित्त राष्ट्रीय गणित वर्ष घोषित किया था। तबसे भारत में 22 दिसम्बर को गणित दिवस मनाया जाता है, परन्तु यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है की भारत में श्रीनिवास रामानुजन के कार्य पर विशेष कार्य, अनुसंधान नहीं किया जा रहा। केन्द्र एवं राज्यों की सरकारों तथा देश में गणित पर कार्य करने वाले विद्वानों एवं विश्वविद्यालयों को इस पर चिंतन करके कुछ ठोस कार्य करने के बारे में विचार करना चाहिए।श्री निवास रामानुजन का जीवन एवं कार्य मात्र भारत के ही नहीं विश्व के गणितज्ञों, शिक्षकों एवं छात्रों के लिए प्रेरणादायी है। 

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