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देशद्रोह के आरोपियों के प्रति हमदर्दी दिखाना अफ़सोस जनक

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अरुण कुमार सिंह (सम्पादक)

16 फरवरी 2016 को दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के परिसर में खुलेआम देशद्रोह के नारे लगे, इसमें दिल्ली पुलिस ने 13 जनवरी को अदालत में आरोप पत्र पेश कर दिया। इसमें छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार, उमर खालिद सहित दस लोगों को आरोपी बनाया गया।

हालांकि अभी अदालत का फैसला आना है, लेकिन राजनीतिक दलों के नेताओं ने आरोपियों के साथ हमदर्दी जताना शुरू कर दिया है।

कांग्रेस के नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री पी चिदम्बरम, पीडीपी की महबूब मुफ्ती आदि ने पुलिस के आरोप पत्र पर सवाल उठाए हैं और कहा कि यह कार्यवाही लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए की गई है। एक बार यदि यह मान भी लिया जाए कि आरोपियों के खिलाफ चुनाव को देखते हुए कार्यवाही की गई है तो क्या इससे आरोपियों का आपराध कम हो जाएगा। सबने देखा और सुना कि किस तरह सरकारी यूनिवर्सिटी में भारत तेरे टुकडे़ होंगे जैसे नारे लगे।

क्या देश विरोधी नारे लगाने वालों के खिलाफ कार्यवाही नहीं होनी चाहिए? जो युवा अपने ही देश के टुकड़े होने के नारे लगा रहे हैं क्या उन्हें सजा नहीं मिलनी चाहिए? शायद भारत एकमात्र ऐसा लोकतांत्रिक और धर्मरिपेक्ष देश होगा जहां देश विरोधी नारे लगाने वालों के साथ राजनीतिक दलों के नेता खड़े हो जाते हंै।

असल में इन नेताओं को भी पता है कि अदालतों से फैसला आने में वर्षो लग जाएंगे। अभी तो मेट्रोपोलियन कोर्ट में आरोप पत्र पेश हुआ है। पुलिस को भी आरोप पत्र पेश करने में तीन वर्ष लग गए। अभी डीजे कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक बाकी है। कई राजनेताओं को लगता है कि देश विरोधी नारे लगाने वालों का समर्थन करने पर भी वोट मिलेंगे। देश के लिए इससे ज्यादा चिंता की बात और कोई नहीं हो सकती।

हालांकि ऐसी सोच की वजह से ही कश्मीर के हालात बिगड़े हैं। आज कश्मीर में खुलेआम देश विरोध नारे लगते हैं तथा पाकिस्तान और आतंकी संगठन आईएस के झंडे लहराए जाते हैं। हो सकता है कि उमर खालिद और कन्हैया कुमार जैसे युवा लोकसभा का चुनाव लड़ कर सांसद बन जाए। अंदाजा लगाया जा सकता है कि तब संसद का क्या हाल होगा। अच्छा होता पी चिदम्बरम, महबूबा मुफ्ती जैसे नेता कोर्ट के फैसले का इंतजार करते

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