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तब लगि बैठ अहउँ बट छाहीं। जब लहि तुम ऐहहु मम पाहीं-वन ही जीवन है

पेड़ लगाओ धरती बचाओ
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   “अश्वत्थोsहं सर्ववृक्षाणाम्”*(गीता)
अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि वृक्षों में पीपल का पेड़ मैं ही हूँ।
      शास्त्रों में पीपल को विष्णु और बरगद को शिव तथा नीम को देवी का स्वरूप माना गया है।
    [object object] तब लगि बैठ अहउँ बट छाहीं। जब लहि तुम ऐहहु मम पाहीं-वन ही जीवन है pl 300x158       स्कन्दपुराण में लिखा है

(अरुण कुमार सिंह )

कि जो व्यक्ति एक अश्वत्थ(पीपल),एक न्यग्रोध(बरगद),एक पिचुमन्द(नीम)अथवा 10 तिंतिणीक(इमली)के या कपित्थ(कैथा),बिल्व(बेल)आमलक(आँवला)के तीन-तीन पेड़ लगाता है अथवा पाँच आम के पेड़ लगाता है ,उसे कभी नरक नहीं देखना पड़ता वहाँ जाना और रहना तो बहुत दूर की बात है।
   [object object] तब लगि बैठ अहउँ बट छाहीं। जब लहि तुम ऐहहु मम पाहीं-वन ही जीवन है uuuu 276x300 इसका अर्थ हुआ कि उपर्युक्त कुछ पेड़ों को तीन,कुछ को 5 व कुछ को 10 लगाने से जो फल मिलता है वही नीम,बरगद ,पीपल में से किसी एक पेड़ को लगाने से ही फल मिल जाता है।इससे इनकी उपयेगिता स्वतः सिद्ध हो जाती है।

  अश्वत्थमेकं न्यग्रोधमेकं पिचुमंदमेकं दशतिञ्तिणीकम्।
कपित्थबिल्वामलकं त्रयञ्च पञ्चाम्रवापी नरकं न पश्येत्।।”(स्कन्दपुराण)
“पञ्चभूमिरुहा श्रेष्ठाः न तु भूमिरुहाः दश।”*
अर्थात् कोख से पैदा होने वाले 10 बच्चों की अपेक्षा पृथ्वी से पैदा होने वाले पाँच पेड़ बेहतर होते हैं।

“पाँच पुत्र दश वृक्ष समान।”

संत बिटप सरिता गिरि धरनी ।
परहित हेतु सबनि कै करनी।।”(रा.च.मा.)
यानी इनकी गणना संतों की कोटि में की जाती है।
“छायामन्यस्य कुर्वन्ति स्वयं तिष्ठन्ति चातपे।*
फलन्ति हि परार्थे च सत्यमेते महाद्रुमाः।।”*
            अर्थात्  स्वयं धूप में खड़े रहकर दूसरो को छाया प्रदान करते हैं। फल भी दूसरों के लिए देते हैं। वास्तव में ये वृक्ष महान् हैं।
नद्यः पिबन्ति सततं स्वमेव नाम्भः,*
           स्वयं खादन्ति फलानि वृक्षाः।*
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः,*
            परोपकाराय सतां विभूतयः।।”*

“वृक्ष कबहुँ नहि फल भखैं ,नदी न संचै नीर।*
परमारथ के कारने साधुन्ह धरा शरीर।।”*

            वृक्ष छाया देते हैं,लाखों रुपये की एक-एक वृक्ष ऑक्सीजन देता है,फलो के अलावा इमारती व जलौनी लकड़ी भी तो ये हमें देते हैं|चिड़ियों को आश्रय देते है|धूप व बरसात में मनुष्य व पशु भी उनका आश्रय ग्रहण करते हैं।
           यह #जुलाई का महीना वृक्षारोपण के लिए सर्वोत्तम है|   
   #परमात्मा सब देखता है ,तराजू उसके हाथ में है ,वह पुण्यकर्ताओं को पद क्यों नहीं देगा जबकि जगत् की सत्ता उसके हाथ में है-
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाए।
कहहु कवनि सिधि लोक रिझाए।।(रा.च.मा.)
*“चींटी के पग नूपुर बाँधे वह भी साहिब सुनता है।”*( कबीरदासजी)
        गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस ओर संकेत किया है-
लागे बिटप मनोहर नाना।”*
“कहुँ-कहुँ सिय कहुँ लखन लगाए।”*
सरयू के किनारे संतों के द्वारा नाना प्रतार के वृक्षों का लगाना,काकभुशुण्डि जी के आश्रम में-
*“पाकरि जंबु तमाल रसाला।बट पीपर……”*
*बर तर कह हरि कथा प्रसंगा।आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा।।”*
*“पीपर तरुतर ध्यान सो धरई।जाप जज्ञ पाकरि तर करई।।”*
*आम छाँह कर मानस पूजा।……”*
विश्वामित्र भी—-
*“तहाँ देखि सुंदर अमराई|……”*
श्रीराम जी-
*“प्रातकाल बट क्षीरु मँगावा|……”*
शंकर जी —
*“तब लगि बैठ अहउँ बट छाहीं। जब लहि तुम ऐहहु मम पाहीं।।”*……आदि आदि अनेक स्थलों पर वृक्षारोपण व उनके पोषण और संरक्षण की ओर इंगित करते हैं।
          आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी  भी यह माना है कि *’यदि पर्यावरण को संतुलित बनाए रखना है तो धरती का न्यूनतम् 1/3 भाग हर हाल में वनाच्छादित होना ही चाहिए।कतिपय गिने चुने देशों को छोड़कर अभी भी विश्व के अधिकांश देश अभी इस लक्ष्य से बहुत पीछे हैं|भारत भी अभी 21 और 22 प्रतिशत के बीच में पहुँचा है। अधिकतम् कोई हानि नहीं किंतु न्यूनतम् तो होना ही चाहिए।
“अधिकस्य अधिकं फलम्”*
     कभी हमारी संस्कृति ही आरण्यक थी । यह संपूर्ण भारतवर्ष *“नैमिषारण्य,दण्डकारण्य……आदि”* नौ बड़े-बडे़ महारण्यों में विभक्त था जहाँ आज 33%लक्ष्य पाने के बजाए विकास अंधी होड़ में आए दिन सामूहिक रूप से थोक के भाव बृक्ष -पातन कर रहे हैं जबकि हमारे ही देश के वैज्ञानिक जगदीशचंद बसु ने सबसे पहले यह सिद्ध किया था कि वृक्षों में भी जीवन है।
     आज वृक्षाभाव के कारण ही #ग्लोबल वार्मिंग,ओजोन परत में छेद…* जैसी अनेक विकृतियाँ पैदा हो रही हैं|कहाँ तक कहूँ *“थोरे महुँ जानिअहिं सयाने’*
यदि मानव जीवन सुखी और समृग्ध बनाना है ,पर्यावरण संतुलित रखना है तो अधिक से अधिक वृक्षारोपण कर उनका पोषण,संरक्षण और संवर्द्धन करना है।
     नवग्रहों में से प्रत्येक वृक्ष पर किसी न रिसी ह्रह का आधिपत्य होता है और वृक्षारोपण से तत्संबंधी ग्रह की अनुकूलता भी प्राप्त होती है ।यथा उदारणार्थ-
मंदार(अर्क)का सूर्य से,पलाश(ढाक/किंशुक)का सोम(चंद्रमा),कत्था(खदिर)का भौम(मंगल/कुज),चिचिड़ा(अपामार्ग/लटजीरा)का बुध,पीपल(अश्वत्थ)का वृहस्पति,गूलर(उदुम्बर)का शुक्र,शमी का शनि ,राहु का दूर्वा और केतु का कुश से संबंध है ,अतः इन-इन ग्रहों के लिए तत्तद् समिधाओं का ही प्रयोग किया जाता है।
             हमारे ऋषि मुनि वर्षा ऋतु के चार महीने परिभ्रमण न करके एक स्थान पर रहकर *चातुर्मास*करते थे जो आज भी कुछ परंपरावादी संत वैसा ही करते हैं।उसके पीछे अनेक कारणों में से अक यह भी था कि बरसात में लता,गुल्म,वीरुध,वृक्षादि जो प्राकृतिक रूप से धरती पर अंकुरित होते हैं तो यात्रा करते समय कहीं उन पर उनका पैर न पड़ जाए और वे पददलित होकर नष्ट न हो जाएँ ।किंतु आज हम उनके उत्तराधिकारी होकर लहलहाते पेड़ गिराने में यहाँ तक कि अपनी ही आगामी पीढ़ी की भ्रूण हत्या तक का महापाप करके ,आत्म़घाती कदम उठाकर अपने कल्याण की कामना करते हैं जैसे मानो *मुकुर मलिन अरु नयन बिहीना।”* अथवा अपनी दोनों आँखें निकालकर फिर सीसे में अपना स्वरूप देखना चाहते हैं क्योंकि हम तथाकथित पढ़े लिखे मॉडर्न हो गए हैं |
*“ब्रह्महत्यायां यत्पापं तद्विगुणं गर्भपातने।*
*तस्य प्रायश्तितो नास्ति तस्यास्त्यागो विधीयते।।”*
हमें पता नहीं हम कहाँ जा रहे हैं-
*“हम कौन थे क्या हो गए और क्या होंगे अभी|*
*आओ बिचारें बैठमिलकर ये समस्याएँ सभी||”*( राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त)
*“निज कर नयन काढ़ि चह दीसा।……”*(रा.च.मा.)
अतः हम कह सकते हैं कि-
*‘वृक्ष लगाओ धरती बचाओ।’*
*“सर्वे भवन्तु सुखिनः।”*

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