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प्रवासी भारतीय दिवस : मॉरीशस में पुरखों से मिला ज्ञान, बढ़ा रहीं हिंदी का मान

वाराणसी, रुपाली सक्सेना । हिंदी सहित अन्य भाषाओं के संयोजन के क्षेत्र में सफलता के सोपान तय कर रहीं सुवराता सूकुन अब भी अपने पुरखों के देश भारत की गंध अपने आस-पास हमेशा महसूस करती हैं। जब भी उत्तर से चली समुद्री हवाओं के झोंके उनके तन-बदन से टकराते हैं, उन्हें रोमांचित कर जाते हैं। 

वे कहती हैं हवा के ये झोके मुझे जो ऊर्जा देते हैं उसे सिर्फ वही महसूस कर सकता है, जिसने अपने संस्कारों में पुरखों से मिली विरासत को जिंदा रखा है। सूकुन अब पूरी तरह मॉरीशस की हैं, लेकिन हिंदुस्तान की हिंदी और बिंदी उनके वजूद का अंग बन चुकी हैं। उनके पूर्वज 1900 में बिहार से जाकर मॉरीशस में बस गए थे। सुवराता का जन्म भी वहीं हुआ। परिवार से मिले मूल्यों के कारण अपनी मातृ भाषा को लेकर जिज्ञासा स्वाभाविक बात थी। लिहाजा उन्होंने न सिर्फ हिंदी की बेहतर शिक्षा हासिल की, बल्कि अन्य लोगों को बेहतर तरीके से हिंदी सिखाने की भी ठानी। बतौर एजुकेटर उन्होंने प्राइमरी स्तर पर हिंदी भाषा की तालीम देनी शुरू की।

प्रवासी भारतीय दिवस : मॉरीशस में पुरखों से मिला ज्ञान, बढ़ा रहीं हिंदी का मान

हिंदी सहित अन्य भाषाओं के संयोजन के क्षेत्र में सफलता के सोपान तय कर रहीं सुवराता सूकुन अब भी अपने पुरखों के देश भारत की गंध अपने आस-पास हमेशा महसूस करती हैं।

वहीं सरल तरीके से हिंदी सिखाने-समझाने के लिए उन्होंने सचित्र डिक्शनरी की वैल्यूम श्रृंखला ईजाद की। हिंदी, अंग्रेजी व फ्रेंच भाषा के संयोजन वाली यह डिक्शनरी मॉरीशस में बसने वाले अन्य मुल्कों के लोगों के लिए मुफीद साबित हो रही है। सुवराता का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सर्वांगीण विकास के लिए उम्दा कार्य कर रहे हैं। कहती हैं देश की समृद्धि एवं विकास में सभी की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए, ताकि भारत दुनिया की शीर्ष आर्थिक व राजनैतिक ताकत बन सके। 


डॉ. रेशमी रामदोनी की पुस्तक का विमोचन : प्रवासी भारतीय दिवस के दूसरे दिन 22 जनवरी को मॉरीशस की लेखिका डॉ. रेशमी रामदोनी की पुस्तक का विमोचन भी किया जाएगा। डा. रेशमी की शिक्षा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से भी हुई है। वह बतौर शिक्षक महात्मा गांधी संस्थान, मोका, मॉरीशस में भी कार्यरत रही हैं। वहीं मॉरीशस में महिला-अधिकार, बाल-कल्याण तथा श्रम मंत्रालय में सलाहकार पद पर भी अपनी सेवाएं दे चुकी हैं। वाराणसी में जब उनकी पुस्तक का विमोचन होगा तब वह न सिर्फ अपने पूर्वजों की भूमि पर होंगी बल्कि उस काशी में भी होंगी जहां उन्होंने शिक्षा ग्रहण की है।

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