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श्रीमद्भागवत के प्रवचन से मिलती दक्षिणा भी लगाते रहे विश्वविद्यालय में–मदनमोहन मालवीय जयंती विशेष madan mohan malviy 660x330

श्रीमद्भागवत के प्रवचन से मिलती दक्षिणा भी लगाते रहे विश्वविद्यालय में–मदनमोहन मालवीय जयंती विशेष

      पं0 मदनमोहन मालवीय जयंती (25 दिसम्बर) : —-श्रीमद्भागवत के प्रवचन से मिलती दक्षिणा भी लगाते रहे विश्वविद्यालय में ।  अद्वितीय एवं विलक्षण प्रतिभा  भी ईश्वरीय कृपा से मिलती है । इसके साक्षात प्रमाण काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक पं0 मदनमोहन मालवीय जी थे । वे 17 वर्ष के थे, तभी उनका विवाह विंध्याचल धाम के नगर मीरजापुर में 1878 में हुआ । इलाहाबाद से 7 दिन चलकर उनकी बारात बैलगाड़ी से मीरजापुर के बड़ी माता मुहल्ले में आयी ।

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      यहां 7 दिन बारात रुकी । बैलों को खाना (सानी) वे खुद देते रहे  । सातों दिन मां विंध्यवासिनी की बहन की मान्यता से पूजित होने वाली शीतलामाता (बड़ीमाता) में वे श्रीदुर्गासप्तशती का पाठ कर मातृ शक्ति की कृपा हासिल की । पुनः बारात सात दिनों में वापस इलाहाबाद हुई ।   मालवीय जी एकेडमिक सर्टिफिकेट की जगह काबिलियत एवं विद्वता को महत्त्व देते थे । यही कारण है कि हिन्दू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में अध्यापन हेतु नियुक्ति में उन्होंने मिर्जापुर निवासी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल  के पास अपेक्षित योग्यता न होने के बाबजूद तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए उन्हें  ही नियुक्त किया ।

    28 वर्ष के शुक्ल जी के ज्ञान से नागरी प्रचारिणी सभा के एक कार्यक्रम में मालवीय जी इतने प्रभावित हुए थे कि विभागाध्यक्ष पद से बाबू श्यामसुन्दर दास के रिटायर होने पर पहले से कार्यरत डी लिट् डिग्री धारी डॉ पीताम्बर दत्त बड़ध्वाल की जगह अध्यक्ष पद पर शुक्ल जी को ही प्रोन्नति दी ।     

   मालवीय ने साल 1904 में ही बीएचयू के स्‍थापना की रूपरेखा बना ली थी। उस दौरान देश में अंग्रेजों का शासन था। ऐसे वक्त में उन्होंने चंदा लेकर साल 1906 में इस यूनिवर्सिटी की आधारशिला रखी। देश के इतिहास में यह पहला मौका था जब किसी संस्थान के लिए ऐसा अभियान चला था। बीएचयू पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट के प्रमुख प्रो. कौशल किशोर मिश्रा ने उस मिशन से जुड़े फैक्ट्स शेयर किए।
दान में मिला था जूता
:- महामना ने यूनिवर्सिटी के लिए एक करोड़ जुटाने का टारगेट रखा था। उन्होंने इस मिशन के लिए 20 लोगों की टीम बनाई थी।
:- प्रो मिश्रा ने बताया, उस वक्त की भारत सरकार को यूनिवर्सिटी ओपन करने की एप्लीकेशन के साथ एक करोड़ रुपए जमा करने थे। मालवीय जी ने यह टारगेट 3 महीने में पूरा कर लिया था।
:- इस मिशन से जुड़ा एक किस्सा प्रचलित है। मालवीय जी ने एक निजाम के घर पर गुहार लगाई थी। उस निजाम ने उन्हें एक जूता भीख के तौर पर दिया था।
:- मालवीय जी का हौसला इससे टूटा नहीं। वो उसके घर के बाहर निकले और जूता नीलाम करने लगे। बोलियां लगनी शुरू ही हुईं थीं कि निजाम दौड़ा-दौड़ा उनके पास माफी मांगने आ गया। उसने उन्हें अपने घर बुलाया और पैसे दान दिए।ये थी मालवीय जी की टीम
1. राजा रामपाल सिंह2. पं. दीनदयाल शर्मा3. गंगा प्रसाद वर्मा4. बाबू ईश्वर शरण5. गोकर्ण नाथ मिश्रा6. इकबाल नारायण गुर्टू7. राय रामानुज दयाल बहादुर8. सदानंद पांडेय9. लाल सुखबरी सिन्हा10. बाबू बृजनंदन11. राव बैजनाथ दास12. बाबू शिव प्रसाद गुप्त13. मंगला प्रसाद14. रामचन्द्र15. ज्वाला प्रसाद16. ठाकुर महादेव सिंह17. परमेश्वर नाथ18. विशम्भरनाथ बाचपाई19. रमाकांत मालवीय20. बाबू त्रिलोकी नाथ

श्रीमद्भागवत के प्रवचन से मिलती दक्षिणा भी लगाते रहे विश्वविद्यालय में–मदनमोहन मालवीय जयंती विशेष madan mohan malviy

    आध्यात्म के गहरे जानकार मालवीय जी भागवतकथा भी सुनाते थे । उसमें जो दक्षिणा मिलती वह भी विश्वविद्यालय निर्माण पर खर्च कर देते थे ।    प्रतापगढ़ के राजा कालाकांकर द्वारा प्रकाशित ‘अभ्युदय’ समाचार पत्र में  बतौर सम्पादक आजादी के आंदोलन को धार दिया । अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध जागरूकता एवं तत्कालीन समाज को सम्बल प्रदान किया । राजा साहब ने जब मालवीय जी को सम्पादक बनाया था, तब मालवीय जी ने शर्त रखी थी कि वे प्रेस में शराब पीकर नहीं आएंगे । राजा साहब 2 वर्ष तक तो शर्त का पालन किया लेकिन  एक दिन  वे प्रेस में शराब पी कर आ गए । मालवीय जी को राजा साहब का व्यवहार नागवार लगा और प्रेस की ड्योढ़ी पर इस्तीफा लिखकर रख दिया और घर लौट आए । मालवीय जी के सम्बंध में अनेकानेक संस्मरण उनकी प्रत्युतपन्नमति को दर्शाते हैं ।

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