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एक ऐसी कवित्री जिसकी कविता आप बार -बार पढ़ना चाहेंगे—

पल्लवी मिश्रा एक ऐसी कवयित्री है जिसे एक बार पढ़ने के बाद आप बार-बार पढ़ना चाहेंगे!इसलिए हमने सोचा कि आप भी उनकी मर्मस्पर्शी कविताओं का आनंद उठाये!!

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मेरे जैसे लोग,
ज्यों उठ आते हैं
रिश्तों की जलती अँगीठी से
उफनते कनस्तरों को उतारे बिना
धधकती अँगीठी पर
उफनते कनस्तर
उठाते हैं धुँआ और शोर
और फिर
बचती है –
एक बुझी अँगीठी।

मेरे जैसे लोग,
जब लौट पड़ते हैं
बेतुके चौराहों तक जाते गलियारों से
छोड़ आते हैं
कई-कई दरवाजों में बंद
एक छोटा कोना कोई
जिस कोने पर रखी
पारे-सी उदासी –
बढ़ाती, घटाती जाती है
कमरे का तापमान।

अपने कोनों पर
सजा लो कितने ही फूल, गमले, किस्से
पर पारे-सी उदासी
अनचाहे-ही,
लिए जाती है तुम्हें
अकेलेपन के खंडहरों पर
जहाँ रिसती है टीस-भरी
नदी कोई।

मेरे जैसे लोग,
जब खोल आते हैं
रिश्तों की मनोकामना वाली गाँठ
शिकन भरे रिश्तों के रेशे
उलझने लगते हैं बार-बार
मंदिरों की घंटियों,दरवाजों और रास्तों पर।

मेरे जैसे लोग,
ज्यों थाम लेते हैं क़दम,
रात-भर लहकती
रात की रानी,
ठान लेती है चाँदनी से
कहा-सुनी के सिलसिले
और बढ़ती जाती है
गहराती रातों में,
बियावानी शिकायतें।
जो दर्ज़ नहीं हुईं कभी
पर
महसूस होती रहीं
जले हुए छालों-सी।
ऐसी ही किन्ही रातों में
मुझ जैसे लोग
चाँद के ऊपर लगा
“चंद्रबिंदु” होते हैं।

मेरे जैसे लोग,
तुम्हारे देव-स्थान में रखा
वह दक्षिणवर्ती शंख
जिसके भीतर
गूँजता है समुद्र का अथाह गान।
जिसे कानों से लगा
नहीं सुना गया कभी।
#पल्लवी

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