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जज लोया मौतः सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब आईं ऐसी प्रतिक्रियाएं

जज बीएच लोया की मौत मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि उनकी मौत प्राकृतिक (नैचुरल) थी और इसकी जांच नहीं होगी। कोर्ट के इस फैसले को वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने निराशाजनक बताया है। प्रशांत भूषण ने कहा कि याचिकाकर्ता के उद्देश्य पर सवाल उठाया गया है। एक स्वतंत्र जांच की मांग करना इतना गलत क्‍यों है? ये याचिका राजनीतिक कैसे थी। 

   [object object] जज लोया मौतः सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब आईं ऐसी प्रतिक्रियाएं nnnmm        कांग्रेस का कहना है कि सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले की जांच कर रहे सीबीआई के विशेष न्यायाधीश बी . एच . लोया की कथित रूप रहस्यमयी परिस्थितियों में हुई मृत्यु की स्वतंत्र जांच की मांग करने वाली याचिकाओं को खारिज करने के उच्चतम न्यायालय के फैसले से और सवाल उठेंगे। पार्टी का कहना है कि जब तक यह तर्कपूर्ण निष्कर्ष तक नहीं पहुंचता उनमें से कई प्रश्न अनुत्तरित रहेंगे। कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने ट्वीट किया है, ”लोया मामले के फैसले का निष्पक्ष विश्लेषण पूर्ण तार्किक आधार पर पहुंचना चाहिए। लेकिन , जब तक इसका तर्कपूर्ण निष्कर्ष नहीं निकलता, यह और सवाल खड़े करेगा और कई अनुत्तरित रहेंगे। 
 

दरअसल प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर और न्यायमूर्ति डी. वाई. चन्द्रचूड़ की पीठ ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों और बंबई हाई कोर्ट के न्यायाधीशों के खिलाफ गंभीर आरोप लगाकर न्यायपालिका को विवादित बनाने का प्रयास किया जा रहा है। 

पीठ ने कहा, ”लोया की मृत्यु की परिस्थितियों के संबंध में चार जजों के बयान पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। साथ ही रिकॉर्ड में रखे गए दस्तावेजों और उनकी जांच यह साबित करती है कि लोया की मृत्यु प्राकृतिक कारणों से हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन याचिकाओं से यह एकदम स्पष्ट है कि इसका असली मकसद न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला करने का प्रयास था। कोर्ट ने कहा कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के मकसद से इस तरह की ओछी और हित साधने वाली याचिकाएं दायर की जा रही हैं। 
     
आपको बता दें कि सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे सीबीआई अदालत के न्यायाधीश बी एच लोया की रहस्यमय परिस्थितियों में हुई मृत्यु के संबंध में दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं और महाराष्ट्र सरकार के वकीलों के बीच तीखी तकरार हुई थी। वरिष्ठ अधिवक्ताओं के इस तरह के आचरण को लेकर पीठ ने गहरी नाराजगी व्यक्त की थी। 
     
महाराष्ट्र सरकार की ओर से बार-बार यह दावा किया था कि स्वतंत्र जांच के लिये दायर याचिकायें प्रायोजित हैं। राज्य सरकार ने यह भी कहा था कि याचिकाओं का मकसद इस एक व्यक्ति के खिलाफ मुद्दे को हवा देते रहना है। राज्य सरकार ने कोर्ट से अनुरोध किया था कि इस मामले में जांच का आदेश नहीं दिया जाये क्योंकि इससे न्यायाधीशों और न्यायपालिका के प्रति लोगों के मन में संदेह पैदा होगा। 
     
इन याचिकाओं पर सुनवाई के राज्य सरकार ने यह भी तर्क दिया था कि याचिका में किये गये अनुरोध पर कोई भी आदेश देते समय न्यायालय को बहुत सावधानी बरतनी होगी क्योंकि जांच के आदेश देने की स्थिति बंबई उच्च न्यायालय के पीठासीन न्यायाधीशों और यहां तक कि प्रशासनिक समिति को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के अंतर्गत अपने बयान दर्ज कराने होंगे। 
     
इस मामले की स्वतंत्र जांच कराने के लिये बंबई लायर्स एसोसिएशन , कांग्रेस नेता तहसीन पूनावाला और महाराष्ट्र के पत्रकार बी एस लोन ने शीर्ष अदालत में याचिकायें दायर की थी। 

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