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संकल्पों और घोषणापत्रों के मायाजाल का भारत !

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सरकार में इमानदारी के नाम पर घूसखोरी के रेट बढे है ! सरकार का मशीनरी पर कोई नियन्त्रण नहीं ! तमाम गरीबो को राशन कार्ड नहीं बने है ,गैस कनेक्शन तथा आवास से वंचित होना पद रहा है यह सरकार की कमजोरी नही तो और क्या है ! आयुष्मान भारत स्वास्थ्य सेवाओं में सबसे अछि सेवा है लेकिन इसका लाभ कितने लोगो को मिल पा रहा ?केवल कुछ प्रतिशत को ही क्योकि बाकियों के पास कार्ड ही नही है !

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कांग्रेस का घोषणा पत्र बनाम बीजेपी का संकल्प पत्र। देश की दोनों बड़ी पार्टियों ने मतदाताओं के सामने अपनी-अपनी बात रख दी। उन्हें अपने-अपने भविष्य की योजनाएं बता दीं। इस पर अलग से बहस हो सकती है कि वोटर्स इन घोषणाओं पर कितना यकीन करेंगे?


अरुण कुमार सिंह (सम्पादक)

उपर से तुर्रा ये की वोट की खातिर देश की सुरक्षा से भी समझौता ! धारा ३७० को न हटाने अस्पा के प्रावधानों को सिथिल करने जैसे बाते कांग्रेस के घोषणा पत्र में लिखी है ! क्या यह देश की सुरक्षा के लिए उचित है ! सवा सौ साल पुरानी पार्टी को चुनाव जीतने के लिए इतने घतिये हत्कंडे अपनाने पड़े क्या यह उचित है !


वोटिंग के लिए तय की हुई अपनी प्राथमिकताएं कितनी बदल लेंगे? लेकिन जो एक बात सबको बता है, वह यह कि घोषणाएं हों या संकल्प, अगर इन पर अमल किया गया होता, तो 2019 में भी पार्टियां गरीबी हटाने, मुफ्त की चीजें देने, किसानों को फसल की कीमत देने, मजदूरों को काम देने आदि-आदि के वादे नहीं कर रही होतीं। ये चीजें 1947 के बाद से अब तक पूरी होने के इंतजार में ही नहीं होतीं।

आंकड़े और जमीनी सच

सही है कि सबसे ज्यादा समय तक देश और राज्यों में राज करने वाली पार्टी कांग्रेस ही रही। लिहाजा सबसे ज्यादा जिम्मेदारी भी उसी की बनती है। सड़कों-रेलों और हवाई मार्गों का जाल, बिजली की उपलब्धता, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े कई महान आंकड़े, सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों की संख्या, देश के एविएशन सेक्टर में हुई कथित क्रांति, विज्ञान की उपलब्धियां सुन और पढ़कर गर्व के मौके देती हैं, लेकिन बहुसंख्यक आबादी जब महज दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए संघर्ष कर रही होती है, तो साथ ही शक भी गहरा हो जाता है।

सवाल कौंधने लगते हैं कि जो हुआ है, उसके लाभ क्या-क्या हैं? आबादी का बड़ा हिस्सा प्राइवेट अस्पतालों की दहलीज भी नहीं लांघ सकता। अच्छे प्राइवेट स्कूलों में अपने बच्चों को शिक्षा नहीं दिला सकता। सस्ती हवाई सेवा का लुत्फ नहीं उठा सकता। चमचमाते हाईवे उसके लिए बहुत ज्यादा मायने नहीं रखते। वह तो अभी भी साफ पीने के पानी का भी मोहताज है। संसाधनों पर से उसकी पकड़ी ढीली ही होती जा रही है।

उपर से तुर्रा ये की वोट की खातिर देश की सुरक्षा से भी समझौता ! धारा ३७० को न हटाने अस्पा के प्रावधानों को सिथिल करने जैसे बाते कांग्रेस के घोषणा पत्र में लिखी है ! क्या यह देश की सुरक्षा के लिए उचित है ! सवा सौ साल पुरानी पार्टी को चुनाव जीतने के लिए इतने घतिये हत्कंडे अपनाने पड़े क्या यह उचित है !

कौन-सा ‘न्याय’ दे रही है कांग्रेस?

कांग्रेस मानती है कि देश के 5 करोड़ परिवार यानी करीब 25 करोड़ लोगों को ‘न्याय’ की जरूरत है। ये समाज में सबसे निचली पायदान पर मौजूद आबादी है। ऐसा नहीं है कि इनके ठीक ऊपर मौजूद दसियों-बीसियों करोड़! शिक्षा ब्यवस्था को चौपट कर देने वाली कांग्रेस अब फिर से न्याय की बात करती है ! देश के नौनिहालों को देश प्रेम की कहानियों जो सच्चाइया थे से वंचित कर दिया गया !क्या यही न्याय है ! आज जिन मुद्दों पर कांग्रेस
घोषणा पत्र ला रही है क्या वे मुद्दे तब नहीं थे

लोग खुशहाल हैं। सच तो ये है कि उनकी जिंदगी भी जीवन चलाने की चिंताओं में ही बीत रही है। राजनीतिक पार्टियां कह सकती हैं कि इतनी अधिक आबादी वाले देश में कितना मुश्किल है तमाम लोगों के जीवन में खुशियां भरना।

तो यहीं सवाल ये उठता है कि फिर बड़े-बड़े वादे और दावे क्यों? फिर सवाल ये भी कि 1947 में 40 करोड़ से बढ़कर हम 140 करोड़ के करीब क्यों पहुंच गए? क्यों नहीं लोगों को इतना शिक्षित और तैयार किया गया कि वह समझ सकें कि क्या हमारे हित में है और क्या नहीं?स्वास्थ्य सेवाओं का तब भी टोटा था और आज भी वही हाल है

बीजेपी के नए और पुराने संकल्प

बीजेपी तमाम आरोप कांग्रेस के ऊपर लगाती है। देश को गर्त में बनाए रखने का दोष कांग्रेस पर मढ़ती है। कांग्रेस के किए वादों की याद दिलाकर पूछती है कि आपने इन पर क्या किया? गरीबी हटाओ का नारा दिया। गरीबी हटी नहीं। दशकों बाद गरीबों के लिए ‘न्याय’ का छलावा लेकर आ गए। बीजेपी के आरोपों में कितने तथ्य हैं और कितने तथ्यहीन इसका आकलन देश कर चुका है। तभी तो ये ग्रैंड ओल्ड पार्टी 2014 में 44 सीटों पर सिमटी और फिर एक-एक कर तमाम राज्यों की इनकी सरकारें सत्ताच्यूत हो गईं।

लेकिन इसी बीच सवाल बीजेपी को खुद से भी करना होगा। उन्हें भी अपने नए-पुराने संकल्पों पर गौर करना होगा। गाय, गंगा, कश्मीर और 370 की कहानी, समान नागरिक संहिता, राम मंदिर, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बगैरह-बगैरह। यहां बहस इस पर नहीं है कि बेकारी-गरीबी और जीवन जीने की न्यून अवस्थाओं के मुकाबले ऊपर के इन मुद्दों का कितना महत्व रह जाता है। बात सिर्फ इतनी है कि ये बीजेपी के नारे और वादे हैं, जिन्हें दशकों से हमने सुना और समझा है। क्या ये पूरे हुए? क्या अब भी इस शिकायत की गुंजाइश है कि इन्हें पूरे करने के मौके ही नहीं मिले? केंद्र में 6 साल से ज्यादा वाजपेयी जी की सरकार रही।

सरकार में इमानदारी के नाम पर घूसखोरी के रेट बढे है ! सरकार का मशीनरी पर कोई नियन्त्रण नहीं ! तमाम गरीबो को राशन कार्ड नहीं बने है ,गैस कनेक्शन तथा आवास से वंचित होना पद रहा है यह सरकार की कमजोरी नही तो और क्या है ! आयुष्मान भारत स्वास्थ्य सेवाओं में सबसे अछि सेवा है लेकिन इसका लाभ कितने लोगो को मिल पा रहा ?केवल कुछ प्रतिशत को ही क्योकि बाकियों के पास कार्ड ही नही है !

यूपी में कल्याण सिंह और दूसरे भाजपाई सीएम रहे। फिर केंद्र में मोदी की पिछले तीन दशक की सबसे मजबूत सरकार (जैसा कि खुद बीजेपी कहती है) रही। साथ में बोनस के रूप में लखनऊ में योगी आदित्यनाथ आ गए। कश्मीर में भी आप सरकार में रह लिए और राज्यपाल शासन के जरिये आज भी बने हुए हैं। क्या फिर भी अपने पुराने संकल्पों को पूरे करने की स्थिति में आप नहीं आ पाए?

2014 में जो नए संकल्प लिए थे

जाने दीजिए इन पुराने संकल्पों को। बीजेपी के नए संकल्पों की बात कर लेते हैं। 2013-14 में चलते हैं। अपने कर्मों से पतन को प्राप्त हो चुकी कांग्रेस ने नरेंद्र दामोदर दास मोदी में क्या देखा था? एक वाक्य में कहें तो- अच्छे और बुलंद भारत की उम्मीद ही तो देखी थी। क्योंकि जब आप किसी ऐसे देश (समृद्ध और सशक्त) की कल्पना करते हैं, तो सामान्य मानवीय जरूरतें और खुशहाली के कारण खुद-ब-खुद आपके हिस्से में चले आते हैं। 2019 में क्या भारत इस अवस्था को प्राप्त हुआ? बीजेपी और उनके समर्थक कहेंगे हां? विरोधी कहेंगे बिल्कुल नहीं। निरपेक्ष लोगों की अपनी-अपनी राय हो सकती है।

सही है कि इतने विशाल और विविध राष्ट्र को बनाने और बदलने के लिए 5 साल का वक्त काफी नहीं हो सकता। ये भी सही है कि प्रधानमंत्री मोदी इन 5 वर्षों में कभी भी थककर बैठते नजर नहीं आए। तो क्या इतना ही काफी नहीं था कि बीजेपी अवाम पर भरोसा करे कि वोट देते हुए वे बीजेपी पर दोबारा भरोसा करेंगे? यकीनन ऐसा नहीं हो सकता। राजनीति में आप आदर्श स्थिति की कल्पना कर बैठ नहीं सकते।

मोदी की पिच से दूर चली गई बीजेपी !

लेकिन फिर भी पहले के समर्थक वोटर्स के एक हिस्से छिटकने का डर अगर बीजेपी का सता रहा है, तो इसके लिए जिम्मेदार सबसे ज्यादा खुद ये पार्टी भी है। राज्यों की जीत बता रही थी कि बीजेपी के लिए सबकुछ सही दिशा में ही जा रहा था। 2017 में यूपी में बड़ी जीत कोई मामूली उपलब्धि नहीं थी। चंद महीने पहले मध्य प्रदेश में 15 साल सत्ता में रहने के बावजूद और राजस्थान में सरकार बदलने की तयशुदा रवायत के बीच कांग्रेस के बराबर वोट प्रतिशत पा लेना भी मामूली बात नहीं थी। लेकिन पार्टी ने अचानक नरेंद्र मोदी से उनकी मजबूत पिच ही छीन ली। हो सकता है कि इसमें उनकी भी पूरी सहमति रही हो, लेकिन क्या ये बीजेपी के हित और हक में है?

जिस चुनाव में बीजेपी ‘काम न रह जाए अधूरा’ के नारे के साथ जा सकती थी, उस चुनाव को पार्टी राष्ट्रवाद, गाय, हिन्दू-मुस्लिम, पाकिस्तान, मंदिर आदि-आदि पर ले गई। जबकि ये बीजेपी के पुराने मुद्दे थे। इन मुद्दों पर लौटते ही विपक्ष को मौका मिल गया। ये पूछने का कि इनकी बातें तो आप दशकों से कर रहे थे। सत्ता में रहते हुए इन पर क्या किया? जिस कांग्रेस पर बीजेपी आम लोगों के मुद्दों की उपेक्षा का आरोप सबसे ज्यादा लगाती रही है, वही कांग्रेस मौके का फायदा उठाकर आम लोगों से जुड़े मुद्दों की बात बीजेपी से ज्यादा करती दिख रही है।

जहां दोनों (बीजेपी-कांग्रेस) की नजर नहीं है !

बात शुरू हुई थी संकल्प और घोषणापत्रों से। दोनों के ही मुखपृष्ठ पर एक बात कॉमन है। चुनाव को वनमैन शो बनाने की कोशिश दोनों जगहों पर है। नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी। और शायद यही सबसे बड़ी विडंबना भी है। लोकतंत्र के मूल में विविध सोच और सबकी भागीदारी है। लेकिन दोनों ही खेमों ने इस चुनाव को वन टू वन की लड़ाई में तब्दील कर दिया है। और ऐसा करते हुए ये भूल बैठे हैं कि तमाम राज्यों में तमाम ‘तीसरे’ भी अपने-अपने किले को कसकर बैठे हैं, जिनकी भूमिका शायद 23 मई के बाद मामूली नहीं रह जाएगी। चाहे वे एनडीए के हिस्से के तौर पर पहले से बहुत ज्यादा मजबूत नजर आएं या यूपीए का हिस्सा होकर। या फिर अपनी खुद की एकजुटता से ताकत जुटाकर कहीं दोनों को ही (कांग्रेस और बीजेपी) ललकारने और अपनी शर्तें मनवाने की हालत में न आ जाएं।

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