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वेस्ट डी कम्पोजर की 20 रुपए वाली शीशी से किसानों का कितना फायदा…….

     गाजियाबाद। अगर आप से कहा जाए कि सिर्फ 20 रुपए खर्च करके आप अपने घर में ऐसी व्यवस्था शुरू सकते हैं, जिससे हर साल आपको अपनी खेती लायक पर्याप्त खाद मिल सकती है। उस जमीन में जहां कई तरह के उर्वरक डालने पर फसल नहीं होती वहां फसलें पैदा होनी लगेंगी तो शायद आप एक बारगी यकीन न करें, लेकिन ये सच है। राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र गाजियाबाद के उत्पाद वेस्ट डीकम्पोजर (कचरा अपघटक) से लाखों किसानों को फायदा हुआ है। “देश के करीब 20 लाख किसानों को इसका फायदा मिल चुका है।

    [object object] वेस्ट डी कम्पोजर की 20 रुपए वाली शीशी से किसानों का कितना फायदा…….        300x177  जल्द ही ये संख्या 20 करोड़ तक पहुंचानी हैं। वेस्ट वेस्ट डीकम्पोजर की खास बात है इसकी एक शीशी ही पूरे गांव के किसानों की समस्याओं का समाधान कर सकती है। इससे न सिर्फ तेजी से खाद बनती है, जमीन की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है, बल्कि कई मिट्टी जमीन बीमारियों से भी छुटकारा मिलता है।” डॉ.कृष्ण चंद्र गांव किसान भारती को बताते हैं। डॉ. कृष्ण चंद्र कृषि कल्याण मंत्रालय भारत सरकार के जैविक खेती परियोजना को लेकर शुरू किए गए विभाग राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र, गाजियाबाद के निदेशक और वेस्ट वेस्ट डीकम्पोजर की खोज करने वाले प्रधान वैज्ञानिक हैं। वेस्ट डीकम्पोजर की 20 रुपए वाली शीशी इसके गुण और उपयोगों को लेकर अख़बार, सोशल मीडिया से लेकर संसद तक में सवाल उठे। आखिर 20 रुपए वाली इस शीशी में क्या है, जिससे किसानों को इतने फायदे होने की बात की जा रही है। इससे समझने के लिए किसान भारती  ने गाजियाबाद स्थित केंद्र में जाकर खुद अधिकारियों से बात की।

     “वेस्ट डीकम्पोजर को गाय के गोबर से खोजा गया है। इसमें सूक्ष्म जीवाणु हैं, जो फसल अवशेष, गोबर, जैव कचरे को खाते हैं और तेजी से बढ़ोतरी करते हैं, जिससे जहां ये डाले जाते हैं एक श्रृंखला तैयार हो जाती है, जो कुछ ही दिनों में गोबर और कचरे को सड़ाकर खाद

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 बना देती है, जमीन में डालते हैं, मिट्टी में मौजूद हानिकारक, बीमारी फैलाने वाले कीटाणुओं की संख्या को नियंत्रित करता है।’ केंद्र के सहायक निदेशक डॉ. जगत सिंह बताते हैं। ये भी पढ़ें- 20 रुपए की ये ‘दवा’ किसानों को कर सकती है मालामाल, पढ़िए पूरी जानकारी वेस्ट डीकम्पोजर को किसानों के बहुउपयोगी बताते हुए डॉ. जगत वैज्ञानिक तर्क देते हैं, “ये दही में जामन की तरह काम करता है। एक बोतल से एक ड्रम और एक ड्रम से 100 ड्रम बना सकते हैं। दरअसल सूक्ष्मजीव सेल्लुलोज खाकर बढ़ते हैं, और फिर वो पोषक तत्व छोड़ते हैं जो जमीन के लिए उपयोगी हैं। 

    मिट्टी में पूरा खेल कार्बन तत्वों और पीएच का होता है। ज्यादा फर्टीलाइजर डालने से पीएच बढ़ता जाता है और कार्बन तत्व (जीवाश्म) कम होते जाते हैं, बाद में वो जमीन उर्वरक डालने पर भी फसल नहीं उगाती क्योंकि वो बंजर जैसी हो जाती है।’ अपनी बात को सरल करते हुए वो बताते हैं, “पहले किसान और खेती का रिश्ता बहुत मजबूत था। लेकिन अब उसका सिर्फ दोहन हो रहा है। किसान लगातार फर्टीलाइजर और पेस्टीसाइड वीडीसाइड डालता जा रहा है, उससे जमीन के अंदर इन तत्वों की मात्रा बढ़ गई है। उर्वरकों के तत्व पत्थर जैसे एकट्ठा हो गए हैं।

        क्योंकि उन्हें फसल-पौधों के उपयोग लायक बनाने वाले जीवाणु जमीन में नहीं बचे हैं।” किसानों को भेजने के लिए पैक की जारी बोतलें। वेस्ट डीकम्पोजर एक तो ऐसे तत्व फसल अवशेषों से खुद लेकर बढ़ाता है, दूसरा जो जमीन में उर्वरक के पोषक तत्व (लोहा, बोरान, कार्बन आदि) पड़े हैं उन्हें घोलकर पौधे के लायक बनाते हैं। क्योंकि जिस जमीन में जीवाश्वम नहीं होंगे वो फसल बहुत दिनों तक उर्वरक के सहारे उत्पादन नहीं दे सकती। इसलिए किसानों को चाहिए हर हाल में खेत में गोबर, फसल अवशेष आदि आदि जरूर डाले।” पिछले हफ्ते केंद्रीय कृषि कल्याण मंत्री और राधामोहन सिंह ने इस केंद्र का दौरा कर वैज्ञानिकों से ज्यादा से ज्यादा वेस्ट डीकम्पोस्ट बनाने की बात कही थी।

      केंद्र के मुताबिक इसमे किए गए दावे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है, कई सरकारी संस्थाओं ने ही इस पर रिसर्च की है। वेस्ट डीकम्पोजर को सीधे खेत में न उपयोग करके पहले इसका कल्चर बनाया जाता है। कुछ ग्राम की इस शीशी में मौजूद तरल पदार्थ को 200 लीटर पाने से भरे एक ड्रम में डाला जाता है, जिसमें दो किलो गुड़ डाला जाता है। रोजाना इसे दो बार लक़ड़ी से मिलाना पड़ता है। पांच-6 जिनों में घोल में मौजूद ऊपरी सतह पर झाग बन जाए तो उपयोग लायक हो जाता है।

    डॉ. जगत बताते हैं, “एक शीशी से 200 लीटर तरल खाद तैयार होती है, इसे खेत में छिड़काव कर सकते हैं। गोबर-कचरे पर डालकर उसे खाद बना सकते हैं। इससे बीज का शोधन कर सकते हैं। अगर फसल में फफूंद जैसे रोग लगे हैं तो भी उस पर छिड़काव किया जा सकता है। फिलहाल सही मात्रा में छिड़काव, सिंचाई के साथ प्रयोग से कोई नुकसान की ख़बर नहीं मिली है हमें।” गाजियाबाद के इस सेंटर से रोजाना करीब 400 बोतलें देश भर के किसानों को भेजी जाती हैं। इसके साथ कई किसान खुद वहां पहुंचते हैं।

      किसान भारती की करीब 3 घंटे की मौजूदगी में डॉ. जगत के पास 50 फोन आए होंगे, जबकि 2 दर्जन से ज्यादा अलग-अलग राज्यों से यहां मिलने पहुंचे थे। यहीं पर मिले गुजरात के मूल निवासी और गाजियाबाद मे रहकर गोशालों पर काम करने वाले रमेश पांडया इसका अलग उपयोग बताते हैं।

    “आप मुझे पशु प्रेमी कह सकते हैं, मेरी खुद की गोशाला है और देश की 10 हजार ज्यादा गोशालाओं से जुड़ा हूं। इनमें से हजारों शहरों में हैं। गोबर हमारे लिए बड़ी समस्या थी, इतनी गंदगी हो जाती है कि आसपास के लोग परेशान हो जाते हैं, इसका उपाय मुझे वेस्ट डीकम्पोजर में मिला। अब वो गोबर खाद बनता है, और गोशालोँ की आमदनी बढ़ा रहा है।’ पांडया के मुताबिक वो गुजरात में शिविर लगाकर किसानों को ये कल्चर बंटवा रहे हैं। किसी गांव के एक किसान को दिया जाता हो वो ज्यादा कल्चर बनाकर दूसरे किसानों को देता है।

How much benefit of farmers to the West D composer’s 20 rupees vial?

    अगर किसान मान लें ‘धरती पुत्र’ की ये 5 बातें बुलंदशहर में रहने वाले जैविक खेती के लिए किसानों को प्रशिक्षण देने वाले भरत भूषण त्यागी भी इसे जमीन के लिए उपयोगी बताते हैं। लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथों सम्मान लेने के बाद गांव कनेक्शन के विशेष बातचीत वो बताते हैं, “वेस्ट डीकम्पोजर जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाता है, मिट्टी को नया जीवन देता है, इसमें कोई शक नहीं।’ राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र के मुताबिक खेती से फायदे के लिए किसान ये काम करें देसी खादों का इस्तेमाल करता रहे, ताकि जमीन में जीवाश्म (कार्बन तत्व) कम न हों। जिस जमीन में कार्बन तत्व .5 होते हैं वो जमीन उपजाउ होती है और जिसमें ये तत्व 0.75 होते हैं वो जैविक खेती योग्य हो जाती है। मिट्टी की जांच जरुर कराएं और जमीन में जिस तत्व की कमी हो, सिर्फ वो ही तत्व (फर्टीलाइजर) के रुप में डालें। यानि जिनती जरूरत है। हरी खादों (देसी खाद, तरल खाद या किसी रुप में) में जरुर डालें। जैसे ढैंचा आदि। मिश्रित खेती करें और फसल चक्र अपनाएं।

    खेत में कुछ पौधे धरातल पर तो कुछ ऊंचाई वाले हिस्से पर हों ऐसी फसलें ले, इससे खेत में लगी फसलें प्रकाश संस्लेषण (फोटो सिंथेसिस) का पूरा उपयोग कर जमीन में पोषक तत्व खुद बढ़ा लेंगी। अपनी खेतों में दलहनी फसलों को तरहीज हों। फसल चक्र के रूप में खेत के किसी न किसी भाग में क्रम के अऩुसार अरहर, चना जैसी फसलें बोएं।

     “आमदनी छोड़िए, लागत निकालना मुश्किल” गाँव कनेक्शन संवाददाता से बातचीत करते डॉ. जगत सिंह क्या न करें 1.किसी भी कीमत पर फसल के अवशेष न जलाएं। खेत में फसल जलाने से न जैव कचरा खत्म हो जाता है बल्कि खेत की उपजाऊ परत भी जल जाती है, जिससे सूक्ष्म जीव मर जाते हैं। 2.बिना टेस्टिंग उर्वरक का इस्तेमाल न करें। 3.कीटनाशी और फफूंदनाशी का अंधाधुंध उपयोग न करें। 4.फसलों को ज्यादा पानी न दें, सिर्फ नमी बनाए रखें। इस तरह से पाएं ये प्रोडक्‍ट वेस्‍ट डीकंपोजर राष्‍ट्रीय जैवि‍ खेती केंद्र के सभी रीजनल सेंटर पर उपलब्‍ध है। यह गाजि‍याबाद, बंगलुरु, भुवनेश्‍वर, पंचकूला, इंम्‍फाल, जबलपुर, नागरपुर और पटना के रीजनल सेंटर से प्राप्‍त कि‍या जा सकता है या फिर Hapur Road, Near CBI Academy, Sector 19, Kamla Nehru Nagar, Ghaziabad, Uttar Pradesh 201002,

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