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[object object] लोकतांत्रिक राष्ट्र में गैर संवैधानिक मजहबी अदालतों के गठन पर विशेष

लोकतांत्रिक राष्ट्र में गैर संवैधानिक मजहबी अदालतों के गठन पर विशेष

       लोकतांत्रिक  देश में सभी नागरिक एक संविधान एवं समाजिक सूत्र से बंधे होते हैं और सबको बराबर का अधिकार मिला होता है।सभी धर्म मजहब सम्प्रदाय के लोगों को धर्मनिरपेक्ष देश में अपनी धार्मिक गतिविधियों को संचालित करने का हक होता है लेकिन धार्मिक गतिविधियां संचालित करने के नाम देश में कट्टरता पैदा करके समाज की कौमी एवं राष्ट्रीय एकता को खंडित करने का अधिकार संविधान किसी को भी नहीं देता है।

   [object object] लोकतांत्रिक राष्ट्र में गैर संवैधानिक मजहबी अदालतों के गठन पर विशेष IMG 20180302 WA0668 Copy 218x300  शरीयत अदालत पर अबतक किसी तरह की कोई क्रिया प्रतिक्रिया विरोध नही था लेकिन हिन्दू अदालत का श्रीगणेश होते ही तहलका सा मच गया है।इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर बहस छिड़ी है और राजनैतिक दलों के प्रवक्ताओं के साथ दोनों पक्ष अपने अपने विचार व्यक्त कर रहें हैं।

     इस हिन्दू महासभा की हिन्दू अदालत की विशेषता यह है कि यह महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के समर्थक हैं।महासभा का कहना है कि जिस कानून के तहत शरीयत अदालतें चल रही हैं उसी तरह हिन्दू अदालतें शुरू की गई है और एक साल के अंदर छः सौ हिन्दू अदालतों के गठन का लक्ष्य है। महासभा का तर्क है कि देश गांधी का नहीं भारतवासियों का देश है और गांधी जी उसमें एक नागरिक हैं। उनका मानना है कि अगर गांधी जी नहीं होते तो देश का बंटवारा नहीं होता और हिन्दुओं की यह दुर्दशा नही होती।

      देश का संविधान देश के सभी वर्गों धर्मो सम्प्रदायों पर लागू होता है और किसी भी देश में संविधान सिर्फ एक होता है।संविधान के अनुरूप ही लोकतांत्रिक प्रणाली के तीनों अंग संचालित होते हैं तथा देश की न्यायपालिका के अधीन देश में एक न्याय प्रणाली संचालित होती है जहां पर संविधान के अनुरूप साक्ष्य के आधार पर न्यायहित को देखते हुये फैसले लिये जाते हैं और हर अदालत में वादकारी का हित सर्वोच्च लिखा होता है।

      संवैधानिक व्यवस्था के विपरीत किसी तरह की न्यायिक अदालतों का गठन नही हो सकता है और अगर होता है तो निश्चित तौर पर वह हमारी संवैधानिक न्याय व्यवस्था को अंगूठा दिखाने जैसा है।हमारे देश में शरीयत अदालतें चलती है जो मुस्लिम के विवादों का फैसला करती थी लेकिन अब एक नई हिन्दू अदालत का गठन ही नही किया गया है बल्कि एक अदालत का शुभारंभ भी बाकायदा हिन्दू महासभा द्वारा कर दिया गया है।

       फिलहाल महासभा का स्पष्ट कहना है कि इस तरह की अदालतें गलत हैं तो शरीयत अदालतें बंद कर दी जाय। शरीयत अदालतों हो हिन्दू अदालत हो सभी अदालतें भारतीय संविधान और संवैधानिक न्याय व्यवस्था के विपरीत हैं।देश में संचालित न्याय प्रणाली से अलग धार्मिक अदालतों का गठन संविधान के समानांतर न्याय प्रणाली है जो लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिये उचित नहीं है।

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