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घर के बच्चे डे केयर और बुजुर्ग ऑल्डएज होम में !!!!

कहावत है एक मां-बाप मिलकर चार बच्चों का पालन कर सकते हैं लेकिन चार बच्चे मिलकर एक मां-बाप का नहीं।
 

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डॉ . सीमा सिंह

श्राद्ध माह में इस वर्ष भी हर धार्मिक स्थल काशी, इलाहाबाद, हरिद्वार और गया जैसे स्थानों पर लोगों का अपने पितरों को जल अर्पित करने की भीड़ नजर आयी। हिंदूआे में ऐसी मान्यता है कि बुजुर्गों के मरने के बाद भी उनकी सेवा करनी चाहिए। इसी विषय पर लोक में प्रचलित शाहजहां और औरंगजेब की एक कहानी है।

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जेल में कैद शाहजहाँ की मौत एकदम करीब था। वह एक बूंद पानी को तरस रहा था। बेटे औरंगजेब ने उसपर खूब जुम़र् किए। मरते समय शाहजहां ने कहा ‘‘तुमसे अच्छे तो हिंदू हैं मरने के बाद भी अपने पिता को जल देते हैं।’’
जिस देश में माता पिता को ईश्वर से पहले देखा गया है क्या कारण है उसी देश में आज ऑल्डएज में बुजुर्ग अपनी अंतिम घड़ियां गिन रहे हैं। जो हमारा नैतिक कर्तव्य था वहीं अब कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने लगा है। पिछले दिनों बिहार के मंत्री मंडल से यह खबर आई कि जिसने भी अपने माता पिता की सेवा नही की उसे जेल की हवा खानी होगी। कर्तव्य से जबरजस्ती सेवा करवानी पड़े तक कि यात्रा आखिर कैसे हुई सोचनीय विषय है।
हिंदी के कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ने ‘दिवंगत पिता के प्रति’ कविता में उस बूढ़े पिता को याद किया जो किसी पर बोझ न बनें इसका भरसक प्रयास करता है। ‘’धक्का देकर किसी के आगे जाना पाप है अतः तुम भीड़ से अलग हो गए.’’ बेटे के स्कूल में ‘रिपब्लिक डे’,‘इंडीपेडनस डे’ ‘हिंदी डे’ की तर्ज पर ही इन दिनों ‘ग्रैंड पेरेंट्स डे’ भी बनाया
गया। जिसमें गिनती के बच्चों के दादा-दादी या नाना-नानी आएं। सभी ने अपने दिल की बात कही उसी में एक दादा ने अपने दिल का हाल कहा। एक बार उसका पोता कुर्सी से नीचे गिर गया। दादा उसे उठाने को गए। उन्हें उठाता देख बच्चे की माँ आकर बोली आपने गिरा दिया न मेरे बेटे को।
दादा जी को गुस्सा आया पर चुप रहें। फिर माँ बोली आज के बाद आप छूना भी नही मेरे बच्चे को। दादा जी ने कहा ठीक है मैं कभी तुम्हारे बच्चे को हाथ नही लगाऊंगा। लेकिन याद रखना तुम भी मेरे बच्चे को छूना नही, उससे दूर हो जाओ। भले ही सुनकर हँसी आये। घरों की यही सच्चाई है।
परिवार रोज छोटे हो रहे हैं। ऐसा नहीं है यह बस मिडिल क्लास घरों की समस्या हो। ‘कमला भाटिया’ जैसे नाम भी खबरों में सुनाई दे जाते हैं। इस बुजुर्ग को उसके बेटे ने आगरा के एक वृद्वाश्रम में भेज दिया था। साल भर पूरा होने पर पिंडदान करने बेटा आगरा आता है पिता का श्राद्ध करता है।
खूब दान करता है लेकिन उसी मां से उसी आगरा में मिलने नहीं जा पाता। नोएडा की वह खबर भी डरा जाती है जब मां का कंकाल शरीर घर के सोफे पर औंधे पड़ा हुआ था। किसी को मरने की खबर तक नहीं थी। काफी दिन बाद दरवाजा खुलने पर वह लाश दिखायी देती है। जिसे देखकर मन सिहर जाता है। छह महीने तक बेटा अपनी मां को अमेरिका से फोन नहीं कर पाता।
उसे अपनी मां की क्यों चिंता नहीं हुई क्या यह सवाल भी नहीं बनता। उसे क्यों नहीं लगा मां बूढ़ी और अकेली है। पड़ोसी से ही पूछ लेता कि आखिर मां कैसी है। ऐसे दान तर्पण का आखिर क्या मतलब। जीते जी नहीं पूछना और मरने के बाद श्राद्ध। भारत की वह संस्कृति कहां गयी जो मरता हुआ शाहजहां अपने बेटे औरंगजेब को कह गया था।कॉलेज के दिनों में पहली बार उस सेंट मेरी ऑल्डएज होम में गयी थी।

सब आंटी के साथ पूरा दिन बिताने के बाद हर वर्ष नये साल साल के दिन जाना निश्चित हो कर लिया था। ग्राउंड में सभी के साथ मौज मस्ती करने के बाद कमरे में अकेले बैठी आंटी का चहेरा नहीं भूला जाता। एक वर्ष आंटी वहां नहीं दिखी।
पता किया तो पता चला कि वह कुछ महीने पहले ही मर गयी। उनकी मौत सुनकर मैं कितना रोई थी। क्या आंटी के परिवार में कोई ऐसा नहीं था जिनके पास वह अंतिम समय पर रह सकें। कई सरकारी और गैरसरकारी संगठन इस दिशा में काम कर रहे हैं। हाल ही में ‘सेंट मेरी के प्रबंधन से हुई बातचीत में उसने कुछ जानकारियां साझा की। इसमें एक महीने का दस हजार लगता है। इसमें सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक की व्यवस्था होती है। कपड़े धोकर मिल जायेंगे।
साथ ही उसने यह भी जानकारी दी की कि यहां जगह हमेशा फुल रहती है। किसी के मरते ही वेटिंग के व्यक्ति को वह दे दिया जाता है। जिनका कोई नहीं होता उनके लिए भी कई संस्थाएं काम कर रही है। इस एकल परिवार के कॉसेप्ट ने भारतीय परिवारिक संरचना को पूरा खत्म कर दिया है। एक बुजुर्ग ने बताया ‘‘एक ही बेटा है वह भी बाहर गया। सीनियर सीटिजन क्या करेगा। बाहर आ जाने से दोस्त बन जाते हैं।

अंत का समय कट जाता है। घर के कलेश से मुक्त होकर सीनियर सीटिजन होम की तरफ मुड़ना मजबूरी है। इस ऑल्डएज होम में दो सौ के करीब लोग है। हर रोज एक न एक व्यक्ति मरता है। अपनी मौत आसान लगने लगी है। कईयों का तो कोई नहीं होता है।
अंतिम संस्कार में हम सब मिलकर जाते हैं।’’ कई घरों के बुजुर्ग भी बच्चों के साथ उनके शहर के बंद कमरे में रहने को तैयार नहीं। बच्चों के साथ रहना उन्हें कैद जैसा लगता है। बच्चों का लाइफ स्टाइल उन्हें रास नहीं आता। बच्चे चाहते हैं गांव से आकर उनके माता पिता साथ रहें। गांव-घर में दिन के चारों पहर आज भी लोग अभिवादन करते हैं।
एक वक्त यदि आप नहीं दिखे तो लोग पूंछने आ जाते हैं। इसके उलट शहरों में पड़ोसी की प्राइवेसी का ध्यान रखना कर्तव्य माना जाता है। किसी का हाल-चाल बहुत पूंछना टोकना माना जाता है। वरना नोएडा में कई दिनों तक कंकाल बन चुकी महिला का हाल उसके
पड़ोसी तो जरूर ही पूंछ जाते।
(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक है)

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