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बाहरी गुरु से धोखा हो सकता है लेकिन सत्साहित्य से निरन्तर व्यक्ति वजनदार होता जाता है

                                                                                                           गुरु
                     बाहरी गुरु से धोखा हो सकता है लेकिन सत्साहित्य से निरन्तर व्यक्ति वजनदार होता जाता है Capture 285x300————–
         गुरु का  वास्तविक अर्थ तो यही ध्वनित होता है कि जो जीवन में गुरुता यानि वजन-शक्ति बढ़ाए । यह भौतिक पदार्थों से नहीं बल्कि सत-शास्त्रों के निरन्तर अध्ययन और चिंतन-मनन से ही संभव है ।  बाहरी गुरु से धोखा हो सकता है लेकिन सत्साहित्य से निरन्तर व्यक्ति वजनदार होता जाता है । सच तो यह है कि हर मनुष्य ‘गोविंद’ बन कर ही जन्म लेता है । यही कारण है कि ईश्वर के पाने जैसा सुख जन्म देते ही मां को मिलता है । कबीर कहते है कि भगवान और गुरू दोनों साथ मिले तो गुरू के चरणों मे समर्पित हो जाना चाहिए । जिस गुरू की ओर  कबीर का संकेत है उस गुरू के दो चरण हैं । पहला चरण ‘बुद्धि और दूसरा चरण ‘विवेक’ है ।
     जिसने भी गुरू के इन चरणों को मजबूती से पकड़ लिया उसका गुरूत्व और गुरूत्वाकर्षण  बढ़ जाता है ।  धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष उसी की ओर खींचे चले आते हैं । इस गुरू को बाह्यजगत में तलाशने के बजाय अंतर्जगत में ही तलाशना पड़ेगा । इस गुरू को पाने के लिए मां के गर्भ में नौ माह पोषित होते समय स्नेह, प्रेम, करुणा, दया, आत्मीयता एवं
(सलिल पांडेय)
                   आनन्द की जो अनुभूति हुई उसी को जीवन मे विकसित करने की जरूरत है । ये सारे गुण व्यक्ति के गुरुत्व को बढ़ाते हैं । गुरू के लिए कहा भी गया है कि गुरू वही जो अपने शिष्य से हार जाए । अंतर्जगत का यह गुरू सच में हर पल हारता है । एक एक उपलब्धि, रिद्धि-सिद्धि-समृद्धि देने के बावजूद उसे लगता है कि कुछ और देना बाकी है ।
      कठिनाई यही है कि इसे पाने का स्थान कहीं है और तलाश कहीं और हो रही है । मुठ्ठी बाँध कर जन्म लेते समय बच्चा इसीलिए रोता है कि माँ के गर्भ में जो अनमोल रत्न मिला जिसे वह मुठ्ठी में बांधकर संसार में आया, वहां इसकी जरूरत ही नहीं । अंत मे सब गंवा के खाली हाथ ही लौटना पड़ता है ।
       गोस्वामी तुलसीदास को इसका आभास जन्म के समय ही हो गया था लिहाजा वे रोने के बजाय ‘राम’ बोल पड़े । ढाई अक्षर के इस राम-नाम ने उन्हें अमरत्व प्रदान किया । इसलिए गुरू के लिए सर्वश्रेष्ठ मन्त्रवाक्य ‘शीश कटाए गुरू मिले तो भी सस्ता जान’ शत प्रतिशत सही है । यह ‘शीश’ अहंकार का है जिससे मान-सम्मान, चर्चा-ख्याति के लिए नकारत्मक कार्य करने पड़ते हैं और न जाने कितनी ऊर्जा व्यर्थ में गंवा देनी पड़ती है । अंधकार में प्रकाश फैलाने वाला ‘पूर्णिमा’ का चन्द्रमा यह कह रहा है कि आकाश-सी ऊंचाई और व्यापकता चाहिए तो इन गुणों को बनाए आत्मसात करना चाहिए ।
                                                                                          (लेखक अध्यात्म  से जुड़े विषयों के मर्मग्य है )

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