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भारत की स्थिति ,अमेरिका को समझना होगा

       हम यह मानते हैं कि किसी देश के समाज में कोई बंटवारा या मतभेद है तो वहां स्थायित्व का रास्ता वहां के लोगों को ही निकालना चाहिए। हां, बात अगर मानवीय जरूरतें पूरी करने की हो तो हम सामने आएंगे और तटस्थ होकर सहायता करेंगे। हमारी यह नीति गुटनिरपेक्षता के विचार की पृष्ठभूमि में तैयार हुई है। किसी देश के साथ हमारा रक्षा सहयोग है तो इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि हम उसकी रणनीतिक योजना का हिस्सा बन जाएंगे।

  Image result for अमेरिका के रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस के साथ रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन  भारत की स्थिति ,अमेरिका को समझना होगा Mattis Nirmala  1143004060अमेरिका को समझना चाहिए कि हम उसके व्यापारिक और रक्षा साझीदार जरूर हैं पर न तो हम उसके सामरिक गठबंधन का हिस्सा हैं, न ही उसके जूनियर पार्टनर बनने वाले हैं। हमारी दोस्ती बराबरी के धरातल पर है। हम किसी और देश से भी इसी धरातल पर रक्षा और वाणिज्यिक समझौते कर सकते हैं।

       भारत ने अमेरिका से साफ तौर पर कह दिया है कि वह अफगानिस्तान में विकास कार्य जारी रखेगा लेकिन भारतीय सैनिकों को वहां तैनात नहीं किया जाएगा। भारत की यात्रा पर आए अमेरिका के रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस के साथ द्विपक्षीय वार्ता के बाद संयुक्त वक्तव्य जारी करने के मौके पर रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने एक अमेरिकी पत्रकार के सवाल के जवाब में यह बात कही।

  अमेरिका की ओर से भारत के सामने अफगानिस्तान में सेना भेजने का कोई औपचारिक प्रस्ताव तो नहीं रखा गया है पर पिछले कुछ समय से अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप बार-बार कह रहे हैं कि नए परिदृश्य में अफगानिस्तान में भारत को ज्यादा भूमिका निभानी चाहिए। शायद अमेरिकी सत्ता केंद्रों में इस तरह की चर्चा हो कि भारत को इसके लिए तैयार किया जाना चाहिए।

    उन्होंने कहा कि भारत अफगानिस्तान में स्थिरता बनाए रखने, विकास परियोजनाओं में योगदान करने तथा चिकित्सा के क्षेत्र में हर संभव सहायता करने के लिए प्रतिबद्ध है।

      यह कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी अमेरिकी प्रेजिडेंट इस तरह का संकेत देते रहे हैं। इराक और सीरिया में भी सेना भेजने की अपेक्षा भारत से की गई थी। पर नई दिल्ली ने कहा कि हम वहां राहत और पुनर्निर्माण कार्य में अपनी भूमिका निभा सकते हैं पर सैन्य सहायता नहीं कर सकते।

    भारत की विदेश नीति इस मामले में एकदम स्पष्ट है और इसे बदलने का कोई औचित्य नहीं है। भारत ने अपनी सेना सिर्फ शांति-स्थापना के अंतरराष्ट्रीय अभियानों के लिए भेजी है। किसी देश में जाकर उसके आंतरिक मामलों में शिरकत करना हमारी नीति नहीं है। हमें अपनी संप्रभुता प्यारी है और हम दूसरों की संप्रभुता का भी आदर करते हैं।

 

    यह सही है कि आतंकवाद को लेकर भारत और अमेरिका की चिंताएं एक सी हैं लेकिन उससे लड़ने के हमारे अपने तरीके हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि अमेरिका हमारे स्टैंड को बखूबी समझेगा और दोनों देश मिलकर अफगानिस्तान के सुखद भविष्य के लिए काम करेंगे।

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